खेल

इस जिन्दगीके खेल में, कुछ हार है, कुछ जीत है

सब कुछ यहा, पर कुछ नही, ऐसी अजब ये रीत है

*

क्या सही, क्या है नही, इस खोज में खोता रहा

ढूंडे कहानी अनकही, में हर दिशा जाता रहा

ऐसे जिया, ऐसे जिया जिंदगी।

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कुछ ये किया, कुछ वो किया, अच्छा लगा अपना लिया

कुछ ये किया, कुछ वो किया, जो था गलत दफ़नादिया

ऐसे जिया, ऐसे जिया जिंदगी।

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में कही मंजिल कही, और क्या बनी ये जिंदगी

तू सही, बस तू सही, तेरे सिवा कोई नही

ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी

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इस जिंदगी के खेल में, अब क्या बचा आराम है

तू वो ही कर, जो मन में है, हर काम में फिर राम है

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