सुसंवाद

भूलक्कड़

हम कैसे हे?

आप ने बोहोत बारी पूछा हमें।

हम कुछ बता ना पाएँ

और भूल भी गये पूछना

आप कैसे हो भाई!

ये भूल भी क्या चीज है भोले

भूल से ही भूल जाते है॥

निकम्मे है, कुछ करने को नहीं

तो जाम बनाते है

बीड़ी जलाते है

तेरा नाम गाते है।

खुद को खुद ही भुला बैठे

अब बदनाम कहलाते है।

ये भूल भी क्या चीज है भोले

भूल से ही भूल जाते है॥

अघोर आत्म मंथन

दो कहा है?

हर समस्या के पीछे कोई व्यक्तित्व होता है।

जब ये व्यक्तित्व ही मिट गया तो कैसी चिंता?

किसको चिंता?

फिर क्या बाक़ी ?

फिर चिंता नहीं।

चिंतन सही

अखंड प्रभु चिंतन।

अनुभूति समुद्र मंथन।

कुछ नहीं बचेगा। 

आप भीनहीं बचोगे।

न साधना, ना साध्य, ना साधक

सब विलीन हो जाएगा 

दूजा तो अब कुछ रहा ही नहीं 

और क्या ही कुछ रहा सही?

*

ये अब तक कोई किसी को, 

लब्जों में न बता पाया।

वो कोशिश करता रहा 

वो जताने की

*

वो जीवन संगीत बन गया 

चरित्र साधु साधु हो गया 

जो जो अपनाया सब चला गया

अपनापन भी चला गया

*

गुरु कृपा असीम अपार है

गुरुजन प्रेम चमत्कार है

*

आत्मचिंतन ही परमेश चिंतन

आत्मज्ञान ही परमेश ज्ञान

आत्म कृपा ही परमेश कृपा

दो कहा है?

अघोर आत्म मंथन, ,

साधक प्रेम / संबंध

प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।

भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।

जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।

धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।

॥ ओम अघोर आनंद ॥

साधक

सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।

शिव – चित् + आनंद शक्ति

चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।

शिव शिव शिव कल्याण करी ।

चित्-विलास = आरपार

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , , ,

भीतर झाँको

(भीतर की ओर एक मुस्कुराती यात्रा)

हर दिन — थोड़ा और
| समझो |

हर दिन — थोड़ा कम
| उलझो |

भीतर झाँको

मूर्ख बनो — धीरे धीरे,
शांति से, आनंद में,
{ अनुग्रह में }

भीतर झाँको

खिल रहे हो,
फूल बन रहे हो,
उभर रहे हो,
बस ~ बह रहे हो —
{ सजगता में,
न कि जानने में }

भीतर झाँको

यह सब हो रहा है।
साँस चल रही हे।
अंदर और बाहर,
बिना किसी
शंका के।

खुद को बधाई दो —
{ बनने के लिए नहीं, होने के लिए }

खुद को बधाई दो —
इस अद्भुत अनुराग के लिए,
भीतरी अनुसंधान के लिए।

भीतर झाँको

तुमने खोजा हर जगह,
हर जगह खोजा —
उसे, जो तुम्हारा ही था।
और फिर पाया —
वो खोया हुआ ख़ज़ाना,
बस
भीतर झाँककर।

~

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन, ,

ॐ अघोर आनंद परिचय

कौन हे आप?

रे ऽऽ आरपारी ! एक ही पहचान हमारी, हम भोले के चेले, स्वतंत्र स्वच्छंद अकेले।

रे ऽऽ सच्चे ! स्वयं के बारेमे, स्वयं ही बतलाना, बिलकुल जरूरी नही।

दुनिया तो सवाल करेगी, तो जवाब देना जरुरी नही। पर भीतर जवाब पता होना, जरुरी हे।

सवाल कुछ नये नही, बस वही-वही, वही-वही। इन लाजवाब सवालो का कोई जवाब नही।

क्या? क्यों? कौन? कैसे? कब? कहा? ऐसे सवाल, सब बवाल। तू ना इन्हे चारा डाल, तू खुद को संभाल।

इनसे बचो। पर इन खातिर एक-बारी, स्वयं से स्वयं ही पूछ लेना। आज का सच, सच बताना। प्रश्न से मुक्त हो जाना।

रे ऽऽ सुन ! कुछ सवाल जो ‘कभी किसी से ना पूछने चाहिये’। कुछ वही सवाल जो ‘सबसे जादा पूछे जाते हे’। और उनके सच्चे जवाब – जो कभी ना देना, ये सवाल ही अटकाते-भटकाते हे।

आपका नाम क्या हे?

नाम नाम-मात्र हे, राम-नाम महा-मंत्र हे।

जो आपको जैसे पुकारे वही आपका नाम।

वो जो पुकारे भाता हे, सच्चे ! प्यार का नाता हे। जो पूरा-पूरा जीता हे, आरपार कहलाता हे।

माँ-बाप ने रखा नाम?

माता-पिता ने देह को जन्म दिया, देह को नाम दिया। वो जादा ना टीका, धुल गया। मरने से पहिले ही, पुनर्जन्म साकारा, गुरुतत्व अस्तित्व पुकारा, “ ऽऽ आरपार ऽऽ ॐ अघोरआनंद”।

असली नाम?

नकली वस्तु का असली नाम नही होता।

आप कहासे हे?

यहा से। अभी जहा हे, वहा से।

कहाके रहने वाले? पता?

अभी जहा हे, वहा! याने यहा।

आपका माँ बाप? परिवार?

सारा जगत परिवार हमारा, सनातन सत् सहारा। बाप-भोले, माँ-तारा, शिव-लोक संसार हमारा।

हम सब भूल गये।अब सब रिश्ते-नाते बस सुहृद मित्र समान लगते हे। अब कोई विशेष संबंध नही।पर सत् संबंध हे।

पर यहा कैसे?

ऐसेही भ्रमण करते, यहा पधारे। जैसे हे वैसे। ऐसे।आप का जन्म कहा, कब, क्यू हुआ? इस सवाल का जवाब नही।

आप पढे-लिखे हो? कितने पढे हे?

हम कुछ जादा ही पढे लिखे हे। इसलिए बेकार हे। हमारे लायक नौकरी-व्यवसाय अब तक पैदा ना हुए। इसलिए बेकार हे। हमारी पुश्तोंकी जायदाद हे, इसलिए कुछ नही करते। { ऐसे मत बताओ }। बताओ जितना जरुरी हे पढ़ लिये। पढ़-लिख पाते हे, हिसाब कर पाते हे। प्रभु की कृपा हे।

आप क्या काम करते हे?

हर काम करे बदनाम, भोला निरंतर निष्काम, श्रीसंतगुरुवचन अंतिम आराम, आदेश राम नाम।

{ ऐसे मत कहना }। कहना कुछ छोटा-मोटा काम कर लेते हे। बचे समय प्रभु भजन होता हे।

आप कुछ तो रोजाना काम करते होगे !?

हाँ। कुछ नही-करते, नही-करते, नही-करने मे ही, कितना कुछ हो जाता हे। जीस परिस्थिति, जिस पल, जो जरुरी हे, वो हम से होता हे। पूरी लगन से, हक से, शौक से, काम जारी हे, हम व्यस्त हे। मस्त हे। तंदुरुस्त हे, चुस्त हे। भोले जबरदस्त हे।रे ऽऽ सच्चे ! हम जिस लायक हे, वही हमसे होता हे।

आप की कमाई? खर्चा पानी? गुजारा? कैसे होता हे?

आपकी सहायता से। जिसने पैदा किया, जिसने अबतक पाला, उसकी कृपा से। वैसे अब कुछ और जरूरत नही। सत् काम जारी हे। जो हे, वो सब कुछ हे। अब जितना हे, पर्याप्त हे। अच्छे से गुजारा हो रहा हे। दुनिया पे बोझ नही हमारा, ना दुनिया हम पे बोझा हे।

आपका धर्म? और जाती?

सनातन मनुष्य धर्म, जाती और जीवन।

क्या आप अध्यात्म मे हे?

आपके गुरु कौन हे? कहा हे? क्या वो जिंदा हे? क्या उनसे बात हो सकती हे? क्या उन्हे मिल सकते हे?क्या आप उन्हे अक्सर मिलते हे?

ॐ सच्चे! स्वच्छंद नाथ गुरु-तत्व हे। गुरु-नाम, किसी देह का नाम नही। गुरु कोई देह नही, वो साक्षात् तत्व हे। अपने हर अनुभव से सीखने की, और सीखी जीवन मे उतारने की, जो असीम शक्ति हे, वह गुरु अनुग्रह हे। गुरु-बिन ये नामुमकिन हे।

शिष्य के हृदय, गुरु प्रकट होते हे। गुरु कुछ सिखाते नही, शिष्य गुरुसे सिखता हे। शिष्य का महत्व हे। अगर शिष्य सक्षम हो, तो जगत मे ऐसी कोई ताकत नही, जो आपको स्वयं परिचय से रोक पाए। गुरु वचन सत्य वचन।

रे ऽऽ सच्चे ! शिष्य गुरु से चिपकते नही, और गुरु चिपकने देते नही। हम कच्चे गुरु के चेले नही, जो की सत् गुरु कच्चा होता ही नही, वो तो पक्का पका, ताजा ज्ञानामृत हे। गुरु-शिष्य एक ही चैतन्य हे। वही एक, गुरुपद धारण किए अनुग्रह कारक हे, और वही शिष्यबन गुरुआदेश श्रवण ग्राहक हे। सब एक ही हे, मानो दो में बटा नजर आता हे। गुरु-शिष्य ये रिश्ता नही, यह निष्काम प्रेम का नाता हे, जो एक दूसरेको जखड़ता नही, उलझाता नही बलकि असंगता, स्वतंत्रता से सहज सुलझाता हे।

गुरु सेवा? गुरु दक्षिणा?

सच्चे! गुरुवचन-सत् वचन मानकर, फिर जानकर, फिर परिधानकर, सहज-सावधान, सदा-चेतन, जीवन अनुभव, जो स्वानन्द की अभिव्यक्ति हो। ऐसा स्वात्मभान ही सत् सेवा हे। सच्चे! सत् गुरु कोई सेवा-दक्षिणा लेते नही। सत् शिष्य सेवा जताते नही।

रे सच्चे! सदा साधक रहो, कभी किसके गुरु मत बनो, मार्ग-दर्शक भी ना बनो। बस मित्र भाव से रहो, समत्व भाव से रहो।

इस गुरु-शिष्य झमेले मे उलझो मत। कही किसी गुरु या आश्रम से बन्धो मत। आजीवन साधक हो, साधक ही रहो। असंग रहो, स्वतंत्र रहो। बलकि इस बारेमे, बात भी मत करो, और मत सोचो।

कुछ कल बीते बुरे कर्मो का बोझा?

नही। जो कुछ अच्छा बुरा अज्ञानी से हुआ, सब धूनी भस्म हो गया। साथ साथ अज्ञानी कर्ता भी भस्म हो गया। पर सीख भस्म ना हो पाई, सदा चेतन हे। जो अच्छा बुरा काम हुआ, सो हुआ। पर अपने गलती से सीखा, और वो गलती वापस ना दोहराई। अब ना कोई बोझा, ना ही कोई गधा।

कुछ आनेवाले कल की चिंता?

नही। कोई चिंता नही। जैसे चीताह मुर्दा जलाती, वैसे चिंता जिंदा जलाती। इस पल मे पूरा-पूरा जी लेते हे। ऐसे पल पल जो खिलता हे, गाता हे, झूमता हे। जो स्वस्थ हे, व्यस्त हे, चुस्त हे, मस्त हे, जबरदस्त हे, वो जीवन हे। हम जीव नही, हम जीवन हे। सत् निरंतर निरंजन हे।

शिवलोक! कहा?

जहा अपरिवर्तनीय-परिवर्तन। वैराग्य-ऐश्वर्य उन्मिलन। ज्ञान-भक्ति सम्मेलन। साक्षात शिव-शक्ति आंदोलन।

एक जो मानो दो मे बटा। पर बटा नही, एक ही समाया। स्वच्छंद स्वतंत्र असंग अलमस्त।

अलख निरंजन

ॐ अघोर आदेश, , ,

सुस्वागतम्

अऽउऽम

रे ऽऽ सच्चे ! सही जगह पधारे।

ऽऽ आरपार ऽऽ एक जबर सत् घुमाव ऽऽ एक दिन मे नही सही, एक दिन प्रभु कृपा से हो जाता हे।

ये साधक जीवन एक अखंड परिक्रमा हे, अघोर-आनंद यात्रा हे। बस इस रास्ते चलते चलो। इस राह पे डटके चलना, ही अंतिम मुकाम हे।

ये सबके बस की बात नही। हम उसे नही, वो राह हमे चुनती हे।

सब लिखा हे, अगर ऽ कोई ऽ पढ़ लिया।

वो रस्ता दिखाया, अगर ऽ कोई ऽ चल दिया।

जो जान पाया, जान पाया। जो डूब गया, सो बचगया ।॰

जो मिला खुद-से, खुद-को, जैसे के तैसे ऽऽ आरपार ऽऽ, वह अघोर-आनंद समाया।

बाकी सब अपने-अपने जगह ठीक हे, पर उन-उस सब में वो बात नही, वो बस ऊपरी-ऊपर हे, पर अपार-अपरमपार, ऽऽ आरपार ऽऽ नही।

रे ऽऽ सच्चे ! सदा सावधान, इक-पल ना छूटे आत्मभान।

॰॰। कच्चा मोह-संसार, सच्चा ऽऽ आरपार ऽऽ ।॰॰

जय हो ! सच्चे की।॰

“इस यात्रा मे आपका सदा स्वागत हे।”

ॐ अघोर आदेश, ,
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