हर समस्या के पीछे कोई व्यक्तित्व होता है।
जब ये व्यक्तित्व ही मिट गया तो कैसी चिंता?
किसको चिंता?
फिर क्या बाक़ी ?
फिर चिंता नहीं।
चिंतन सही
अखंड प्रभु चिंतन।
अनुभूति समुद्र मंथन।
*
कुछ नहीं बचेगा।
आप भीनहीं बचोगे।
न साधना, ना साध्य, ना साधक
सब विलीन हो जाएगा
दूजा तो अब कुछ रहा ही नहीं
और क्या ही कुछ रहा सही?
*
ये अब तक कोई किसी को,
लब्जों में न बता पाया।
वो कोशिश करता रहा
वो जताने की
*
वो जीवन संगीत बन गया
चरित्र साधु साधु हो गया
जो जो अपनाया सब चला गया
अपनापन भी चला गया
*
गुरु कृपा असीम अपार है
गुरुजन प्रेम चमत्कार है
*
आत्मचिंतन ही परमेश चिंतन
आत्मज्ञान ही परमेश ज्ञान
आत्म कृपा ही परमेश कृपा
दो कहा है?
