उद्यमो भैरव:
*
जग जा साधक ।
पुकार आलख ।
छोड दे दुनियादारी ।
प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।
विश्व { एवं } मित्र
*
*
जग जा साधक ।
पुकार आलख ।
छोड दे दुनियादारी ।
प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।
विश्व { एवं } मित्र
*
Can you?
YES.
*
What really belongs you, that you can give up on!?
And WHO is giving up? what? Why?
*
We are empty. SOLID SPACE.
my fr!end.
{गुरूवचन सत्यवचन}
*
One thing to give up,
is the very thought of giving up!
*
KNOW Nonsense, NO Nonsense!
*
Relax!Max
*
Giving up! ये बस एक मन की खुजली हे!
साधक को ये बात सुलझी हे।
यहाँ अपना कुछ हे ही नहीं।
क्या त्याग करोगे?
*
बस त्याग के काबिल बनो,
जो जाना हे चला जाएगा,
जो रेहना हे रहेगा।
बस त्याग के काबिल बानो,
तब खुद का भी त्याग होगा।
कुछ छोड़ना, पाना नहीं,
जो चल रहा हे सब सही।
अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी
वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।
ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,
अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।
*
अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।
हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।
कुछ पाना खोना नहीं।
कही आना जाना नहीं।
कोई अपना पराया नहीं।
सब एक हे।
*
स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।
दुनिया बस मन की भ्रांति हे।
मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।
अब कुछ फरक नहीं पड़ता।
~
MIND BLENDING,
MIND BENDING!
MIND ENDING.
“MIND yo!ur MIND”
अभेद भक्ति सावध । साक्षात सत्गुरु सत्संग ।
सृजन नित्य असंग । साधके भजन अभंग ।।
*
विरागी शुद्ध मनन । स्पष्ट स्वरूप चिंतन ।
जीवन मुक्त दर्शन । साधके अघोर साधन ।।
*
अनंत प्रशांत एकांत । सहज संपूर्ण आनन्द ।
शिव स्वरूप उप स्थित । साधके केवल परमार्थ ।।
*
~
साधक विश्व मित्र
⚡💀⚡
परमार्थ में मन नहीं लगता,
मन संसार स्वार्थ में रमता,
जप जाप ताप सा भाता
अब क्या करे साधक?
*
ओ भोले साधक!
मन लगने से जप नहीं होता,
जप जपनेसे से मन लगता हे,
स्वरूप साधना में।
*
जीवन में साधना की नहीं जाती,
साधना में जीवन जीते हे,
जीवन ही साधना हे,
सदा सर्वदा।
साधु संत सत् वचन – को माने
अब तो खुद को – शिष्य तू जाने
हर अनुभव से सीखे – वो साधक
ये दुनिया – जीवनशाला प्यारे
यह जो सिखा – सो जीवन उतारा
खुद देखा उजियाला – प्यारा
*
ये दुनिया – रख जैसी वैसी
ये दुनिया – तो ऐसी ही थी
ऐसी ही रहेगी
दुनिया से – क्या लेना देना?
सारा जीवन – व्यर्थ गवाना
हर पल – कुछ भी – सीख ना आना
*
यहा सच्चा – जो करने आया
अब तो काम – वही हे करना
साधक भोला – राम भरोसे
गुरु चरण पे – माथ टिकाके
शुरू करो साधना
बस शुरू करो साधना।
*
रे ऽ प्यारे ! बस तुम शुरू तो करो यारा
ये दुनिया रख जैसी वैसी,
ये दुनिया तो ऐसी ही थी,
ऐसी ही रहेगी।
दुनिया से क्या लेना देना?
हर पल कुछ भी सीख ना आना,
जीवन व्यर्थ गवाना।
*
यहा भोला जो करने आया,
अब तो काम वही हे करना।
साधक भोला राम भरोसे,
गुरु चरण पे माथ टिकाके,
शुरू करो साधना,
बस शुरू करो साधना।
*
साधु संत सद वचन को माने,
अब तो खुद को शिष्य तू जाने,
ढूँडे जीवनशाला प्यारे,
हर अनुभव से सीखे साधक,
जो सिखा सो जीवन उतारे
खुद देखो उजियाला प्यारे।
*
यह साधक जो करने आया,
सुख साधन अब वही करेगा।
साधक भोला राम भरोसे,
गुरु चरण पे माथ टिकाके,
शुरू करो साधना,
बस शुरू करो साधना।
विश्व गीत मधुर स्वर गाना ।
सत्संग भजन तू कर रोज़ाना।।
साधन गुरु मंत्र तू हर पल जपना।
हर करम शंभु समर्पित करना।।
*
मुफ़्त का खाना कभी ना खाना।
पर साधक भोले मस्त तू रेहेंना।।
सत् संग भजन – कर तू रोज़ाना
विश्व गीत – सुमधुर स्वर गाना
श्री सत् गुरु मंत्र – निरंतर जपना
हर करम – शंभु समर्पित करना
*
बिन सेवा – एक भी पल ना गवाना
तू मुफ़्त का खाना – कभी ना खाना
संसार की खटिया – कही ना सोना
जब दुनिया सोवे – तब तू जगना
*
उस शून्य गुफा – तू डटके रहना
ना कही आना – कही ना जाना
यहा तेरा – कुछ भी ना लेना देना
जो मन चाहे गाली – दे ये जमाना
*
पर साधक भोले – मस्त तू रेहेंना
अलख अमल, अल्-मस्त खजाना
*
रे ऽ सच्चे !
जो आनंद प्रभु-भजन मे हे
{ वो गप-शप मे नही }
जो आनंद तत्व-चिंतन मे हे
{ वो संसार-चिंता से नही }
जो आनंद सरल-त्याग मे हे
{ वो विषय-भोग मे नही }
जो आनंद असंग-एकांत मे हे
{ वो समागम-संग मे नही }
*
जो आनंद – ध्यान मे हे
जो आनंद – मौन मे हे
वो सहज – अघोर आनंद
हम से हे – हम मे हे – हम ही हे
*
वो आनंद – अपना स्वरूप हे
वो आनंद – राम मय हे
वो राम – आनन्दमय हे
वो राम ही स्व स्वरूप हे
*
जगत मे हम नही – जगत हम मे हे
हम तो – हमेशा हे – थे – रहेंगे
हमारा कुछ नही
सब कुछ राम हे
*
रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे
रोम रोम – राम हे
सच ना मिला संसार में।
जगत में उलझा, कभी ना सुलझा,
सब लेन देन व्यापार रे।।
*
स्वान्तर भीतर ड़ुबकी लगाई,
प्रेमानंद मिला उस पार रे।
भोला साधक सब संत क़हत,
यहा प्यार से हो व्यवहार रे।।
*
साधक भोला सरल सहज रह,
मत कर जग से व्यापार रे।
साधक भोला राम भरोसे,
भूल ना जाना प्यार रे।।
सब कैसा हे? जैसा हे, वैसा हे, बढ़िया हे।
क्या हे? सब कुछ, कुछ नहीं।
कब हे? बस अभी, कल नहीं ना कल हे।
क्यों हे? ऐसे ही।
किधर हे? आप जिधर हो।
दुनिया से कुछ वास्ता? पता नहीं, दुनिया क्या हे।
शादी हुई? पिछले जनम।
कभी प्यार हुआ? जबसे हे, प्यार में हे।
किसके? आप के।
क्या मज़ाक़? दुनिया मज़ाक़।
करते क्या हो? बेकार हूँ।
खर्चा पानी ? बस आप की कृपा हे।
समय कैसे बीतता हे? बस गुनगुनाते रहते हे।
सच क्या हे? सब कुछ नहीं।
आनंद में हो? आनंद हम में हे, हम से हे।
ये आनंद मुफ़्त में हे? ये बिकता नहीं, मुफ़्त भी नहीं।
कुछ अच्छी बुरी आदतें? जो भी आप से लग गई, लग गई।
कुछ करना बाक़ी हे? जी नहीं, जिस काम से आए थे, हो गया।
क्या काम? कुछ नहीं।
क्या करोगे? सब हो तो रहा हे, करना क्या हे!
पागल हो? जी बिलकुल।
योगी कौन हे? योगी रोगी ही हे।
रोगी कौन हे? जो भोगी हे।
आप कौन हो? महारोगी।
क्या बीमारी? राम नाम की महामारी।
कोई आख़री ख़्वाहिश? आख़री ऐसा कुछ होता नहीं, जनाब!
मरने का डर? मरना नामुमकिन हे।
समझ? बंधन।
भगवान? साक्षात आप हो।
चेतना? आप से ही हे।
कर्म? प्रभु चिंतन।
असफलता? प्रभु इच्छा।
सफलता? प्रभु कृपा।
कुछ कहना बाक़ी हे? और कुछ पूछना बाक़ी हो, तो कहे।
~
संसारी परेशान बन चल निकला, साधक भोला चाय बीड़ी कर निकला।
तू कौन हे? खुद कौन हे? और कौन हे तेरा खुदा?
सब हे यहाँ, सब हे तेरा, अब और क्या तू चाहता?
सच में बता, सच ही बता, और क्या तू चाहता?
*
रब हे तेरा, रब तुझमें हे, अब और क्या तुझे चाहिए?
क्यू ऐसी हरकत कर रहा? तुझको करे तुझसे जुदा?
क्यू ऐसी हरकत कर रहा? खुद को करे खुदसे जुदा?
*
तू कौन हे? क्यों हे यहाँ? इस जग से क्या तेरा वासता?
तेरे दिल में क्या ? खुल कर बता, क्यू खफ़ा यू हो रहा?
तू बेख़बर, और बेवजाह, यहाँ वहाँ, भटका घूमा?
*
तू कौन हे? खुद कौन हे? और कौन हे तेरा खुदा?
रब हे तेरा, रब तुझमें हे, अब और क्या तुझे चाहिए?
क्यू ऐसी हरकत कर रहा? तुझको करे तुझसे जुदा?
क्यू ऐसी हरकत कर रहा? खुद को करे खुदसे जुदा?
~
हम एक साज़ हे, बे सुरे बज रहे हे।
अगर मन में हरी की बाँसुरी सज रही हे,
अगर दिल मे भोले का डमरू बज रहा हे,
तो हम गीत हे, जीवन संगीत हे।
एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।
{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}
बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?
साधक: जी बोलिए, महाराज।
बुढ़ाऊँ: आप का नाम?
साधक: साधक भोला राम भरोसे
बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?
साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।
बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।
साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।
बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?
साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।
बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।
साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?
बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।
साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।
{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}
बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?
साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।
बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?
साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।
बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।
साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।
बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!
साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?
बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।
साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?
बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।
साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।
शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।
बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?
*
लाखों सपने इरादे, ना एक हकिकत होवे,
फिर भी तू तकता जावे, फिर भी तू थकता जावे।
*
और जब एक भी इच्छा पार हुई, तब दूजी अपना राज चलावे।
ये तो मायाजाल रचा हे, इंद्रधनु मृगजाल गवाह हे,
अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।
अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।
*
तू भवर में डूबा जावे, अब कोन तुम्हें बतलावे,
और कोन किसे हे बचावे, कोन किसे हे बचावे।
*
एक ही साध्य है, एक हे साधन, एक गुरु हे, एक हे भगवन।
साधक खुद ही खुद को जगावे, साधक खुद ही खुद को जगावे।
~
साधक भोला राम भरोसे, ले खाली झोला प्यार परोसे
उद्यमो भैरव:
जग जा साधक ।
पुकार आलख ।
छोड दे दुनियादारी ।
प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।
विश्व { एवं } मित्र
उद्यमो भैरव:
Don’t do meditation. Live in meditation.
हम ये करते हे, वो करते हे, बड़ी साधना करते हे, कहते हे।
असल में ये उँट पटंग, साधना हे?
आख़िर साधना हे क्या?
और साधना से क्या साधना हे?
एक ही साधन हे। बाक़ी सब तमाशा।
अपने अंत:करण की स्थिति को पहचान साधक।
मन तो आइना हे, जगत संसार की प्रतिमा मन में नैसर्गिक हे। जीव- जगत – वस्तु, वातावरण के अनुसार मन में संकल्प-विकल्प आते रहेंगे। अच्छे-बुरे विचार आते-जाते रहेंगे। ये द्वैत की बू स्वाभाविक हे। बाहिर जो हो रहा हे वो होने दो, जैसा हो रहा हे होने दो, अपने भीतर झाँको साधक।
बस इतनाहि करो, ध्यान दो की ये मन इन विचारो से प्रभावित ना हो, विक्षेपित ना हो। इस जगत में अंदर बाहिर कुछ भी हो जावे, साधक का मन कभी विक्षेपित ना हो। कभी किसी बात से मन विक्षेपित हुआ ही, तो उस अनुभव से सीखो। आत्म चिंतन करो। धीरे धीरे मन शांत हो जाएगा।
फिर भी सिख ना पाओ, तो उपासना जैसे सत्संग, भजन, नाम:स्मरण, संत सेवा में मन को लगाओ। उपासना से मन:शुद्धि हो जाती हे। संसारी मन ही साधक मन हो जात हे।
चाहे कैसे भी विचार हो, इन विचारो की शृंखला को ही विक्षिप्त मन कहते हे। अत: राम नाम को अपनी साँस से बांधो। नाम ही इस शृंखला का प्रतिबंध हे। भजन मगन रहो।
स्व स्वरूप में बिलकुल स्थित रहेना हे।
अपने मन की शान्ति कभी, किसी कारण छूटे नाहीं, ये सावधानी ही असल में साधना कहलाती हे।
ये साधना अखंड चलती रहे। इस में बाधा ना आवे।
सदा चेतन रहो, प्रसन्न रहो, सदा आनंद में रहो।
आनंद को पाना नहीं हे। वो तो भोग कहलाता हे। आता जाता हे।
आनंद में रहना हे। आत्म आनंद, बस अपने होने का आनंद।
स्व स्वरूप सत् चिदानंद ही हे।
ध्यान करो नहीं, ध्यान दो।
बस इस बात पे ध्यान दो।
सावधान हो जा साधक।
बाहर कुछ नहीं, सब मन का खेल हे।
बाक़ी कुछ करो ना करो, कुछ फ़रक नहीं पड़ता।
बस भीतर ध्यान दो।
काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह ही मन के विक्षेप हे।
देखो कही किसी व्यक्ति वस्तु विशेष से मन आसक्त तो नहीं?
ये आसक्ति जा-सकती हे।
गुरु वचन सत्य वचन।
शांत, प्रसन्न साधक मन ही, एक में विलीन हो जाता हे।
परमात्म दर्शन अपने भीतर ही हो सकता हे, स्व स्वरूप।
प्रभु कृपा, गुरु कृपा, और अघोर आत्म कृपा से, साधक हृदय में ही परमात्मा प्रकट होता हे।
साधना से कुछ साधना नहीं।
नया कुछ नहीं मिलेगा, जो आपका ही था, हे, रहेगा – वो आपको पुन: प्राप्त होगा।
जाग जा साधक प्यारे।
~
साधक विश्व वाणी
ओ भोले
एक बारी अर्ज़ तो करो
आपके दिल में क्या हे।
ओ भोले
आप के ही इशारो से
तो भोला जीवन जिया हे॥
ज़हरीला दिव्य प्याला
आप ने परोसा है।
हम जाम उठाएँगे
भोले पे भरोसा है॥
ऐसे अदभुत राक्षस है
रावण पेश आते है।
दुनियादारी की आवेश में
दिल से राम नाम गाते है॥
हम कैसे हे?
आप ने बोहोत बारी पूछा हमें।
हम कुछ बता ना पाएँ
और भूल भी गये पूछना
आप कैसे हो भाई!
ये भूल भी क्या चीज है भोले
भूल से ही भूल जाते है॥
निकम्मे है, कुछ करने को नहीं
तो जाम बनाते है
बीड़ी जलाते है
तेरा नाम गाते है।
खुद को खुद ही भुला बैठे
अब बदनाम कहलाते है।
ये भूल भी क्या चीज है भोले
भूल से ही भूल जाते है॥
तेरा प्याला तेरा प्यार
जल गया संसार व्यापार
फिर भी
नशेमे होश बरकरार
ऐसा सब चमत्कार॥
*
हलाहल पी रहा हू
यकिन से मर रहा हू
फिर भी
इस मौत में जान बरकरार
ऐसा सब चमत्कार॥
*
क्या हे सब?
कब हे सब?
जो हे ही नहीं
वो हे सब।
तो बोलो
क्या ही करोगे?
सब गजब
सब गजब
सदा चेतन
सनातन
संत साधन
सनातन
गुरूवचन
सनातन
सामगायन
सनातन
प्रभु भजन
सनातन
संकीर्तन
सनातन
राम शरण
सनातन
स्वरूप चिंतन
सनातन
नाम स्मरण
सनातन
अवधूत मगन
सनातन
हंस गगन
सनातन
सत्य वचन
सनातन
सत्चिदानंदनघन
सनातन
वो जो सर्वत्र है, और हे नही
वो सदा यह ही था।
वो भूलसे,
खुद को भूल जाता है
उसका जन्म होता है
वो नाम रूप पाता है।
जो जाना है,
वो जीता है
जब सीखे वो हर पल
तब साधक कहलाता है।
जग जाता है, जागता है, जगाता है।
हिसाब के परे जीता हे।
जीवन संगीत गाता हे।
~
“जो जाना, वो बन जाना
अब कही ना आना जाना।”
~
“जो ज्ञान वो जीवन उतरा
वो ज्ञान से राह मिलेगी।”
~
“जब हृदय प्रभु प्रीत खिलेगी
तब प्रेम की नदी बहेगी।”
~
अरे सुन, प्रभु भजन मगन दीवाने
हम जाने तेरे बहाने।
*
हर समस्या के पीछे कोई व्यक्तित्व होता है।
जब ये व्यक्तित्व ही मिट गया तो कैसी चिंता?
किसको चिंता?
फिर क्या बाक़ी ?
फिर चिंता नहीं।
चिंतन सही
अखंड प्रभु चिंतन।
अनुभूति समुद्र मंथन।
*
कुछ नहीं बचेगा।
आप भीनहीं बचोगे।
न साधना, ना साध्य, ना साधक
सब विलीन हो जाएगा
दूजा तो अब कुछ रहा ही नहीं
और क्या ही कुछ रहा सही?
*
ये अब तक कोई किसी को,
लब्जों में न बता पाया।
वो कोशिश करता रहा
वो जताने की
*
वो जीवन संगीत बन गया
चरित्र साधु साधु हो गया
जो जो अपनाया सब चला गया
अपनापन भी चला गया
*
गुरु कृपा असीम अपार है
गुरुजन प्रेम चमत्कार है
*
आत्मचिंतन ही परमेश चिंतन
आत्मज्ञान ही परमेश ज्ञान
आत्म कृपा ही परमेश कृपा
दो कहा है?
आप जहा जैसे हो इस वक्त
उसके परे कोई स्वर्ग नही
*
अगर
आप जान पाओ
तो
मुमकिन है
*
नही जान पाओ
तो
मुश्किल है
*
ऐसा ही है
ये दुनिया नश्वर है
इसमे अपना दम ना घुटाओ
गहरा दम लगाओ
सदा आनंद में रहो
*
विधि निषेद की विधि
विधि निषेद का निषेद
ये हे
साधक भोले
अवधूता, अवधूता
गीत गाता
प्रभु-प्रीत जगाता
सत्संग समाता
असंग जीता
अवधूता
*
अवधूता, अवधूता
धूनी रमाता
अलख लगता
चिलम चिताता
शून्य मे रमता
अवधूता
*
अवधूता, अवधूता
खूद को खोता
गगन समाता
ना कभी जीता
ना कभी मरता
अवधूता
*
अवधूता, अवधूता
कुछ नहीं करता
दिख नहीं पाता
बन सबकी माता
विश्व चलाता
अवधूता
*
आदेश नाथ गुरु शिष्य सहारा
सत् गुरु वचन संजीवन गीता
अवधूता, अवधूता
~
आदेश
*
मे मर गया, सो तू भी मरेगा
मारनेवाला, मे से मिलेगा
शिव कैलाश, पता कहेगा
अदबुध मैयत उत्सव होगा
*
जय जय जय शंकर नारा, मे से मारा
जय जय जय शंकर न्यारा, मे को मारा
शिव-गुरु तारण हारा, एक सहारा
मे तो हो गया, भगवन प्यारा
मरगया बाबा, नीर अहंकारा
*
मे मर गया बाबा, राम नाम सत्य हे, नित्य हे।
जीवन मुक्तछंद, स्वानन्द परिंदा
मे मरगया बाबा, सत् स्वरूप जिंदा
*
मे की नाही, मे से मुक्ति
अनुभवानंद सत् गुरु युक्ति
~
सून कपालिका, मेरे खप्पर यारा,
हम माने या ना माने, जाने या ना जाने, हम तो सनातन अघोर साधक है। बस हम भूल चुके हे इस सनातन सत्य को, और यह वहाँ भटक रहे हे, स्वयं की खोज मे। दादाजी की ऐनक; कहानी तो सुनी होगी। प्यारे, अभी कुछ नही बिघड़ा, बस खुद को जगाना हे, याद दिलाना हे। सत्य भीतर दोहराना हे। निर्भय स्वर लगाना हे।अघोर भजन गुनगुनाना हे। युगन युगन हम योगी, हा योगी।अवधूता
यह नाथ भजन, अघोर साधक की आत्म-कहानी हे। ये शब्द, ये धुन अघोर साधक को, इस आनंद यात्रा में एक चैतन्य प्रदान करती अकाट्य जोश पैदा करती हे। जोश में होश बरकरार रख अघोर साधक तत्व चिंतन मगन, निरंतर स्वरूप पथ ही अपनाता हे। सत् गुरु ज्ञान प्रसाद संस्मरण, स्वयं प्रकाश मैं अघोर सत्य लखाता हे। अवधूता, युगन युगन हम योगी।
ओम,
अघोर आनंद
काम जारी हे। ना रुकावट, ना खेद।
ना कही आना जाना
मरगया बाबा दीवाना
ना कुछ पाना खोना
मे उसके हाथ खिलौना
~
मरगया बाबा
राम नाम सत्य हे
नित्य हे
चल ना भाई तू , समझता क्यों नहीं
– जिधर किधर हे अटका, उधर से निकलता क्यों नहीं
दिल तेरा दुनियासे फिसलता क्यों नहीं
– फक़ीर साधु बोला दिमाग़ में घुसता क्यों नहीं – तेरे
गुंडा गर्दी, दुनिया दारी, तू छोड़ता क्यू नही?
– क्या सही क्या गलत फैसला, तू करता क्यों नहीं
दुनिया में इज्जत से तू रहता क्यों नहीं
– चार शब्द बाते प्यार के तू बोलता क्यों नहीं?
तू जानता कुछ नही, ये तू मानता क्यों नहीं
– इधर उधर कुछ भी नही, अपने भीतर झाको
मन क्या तेरा शांत हे? राडे-लफड़े लाखों
जाग जा साधक
मे मर गया बाबा
राम नाम सत्य हे
अमर अनंत नित्य हे
प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।
भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।
जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।
धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।
॥ ओम अघोर आनंद ॥
साधक
सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।
शिव – चित् + आनंद शक्ति
चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।
शिव शिव शिव कल्याण करी ।
चित्-विलास = आरपार
“मे कोन हु?”
१
जब समझो, अगर ये सवाल मेरे मन; मुझे आता ही नही, तो ‘मे’ जैसे ‘जानवर’ हू या पशु-तुल्य हू।देह तो इंसान का हे। लेकिन सिर्फ { खाना – पीना + सोना + घर-बसाना + बच्चे पैदा करना } इतनाही। ऐसे जिंदगी गुजारते गुजारते, एक दिन ‘मे’ गुजर जाना, चल बसना। माने अभी तक कहानी शुरू ही नही हुई हमारी।
२
“भाई! मे हु कोन? कोन हु मे?” जब ये सवाल मे खुद से करता हु, कर पाता हु; तो मे ‘इंसान’ हू, ‘मनुष्य-प्राणी’ हू। खैर अपने इंसान होने का ये एक सिद्ध-लक्षण तो हे। अच्छा! खुद का अभिनंदन किजीए। कम से कम, जो हू समझता हु, कहलाता हू, वो तो हू। हम एक जिंदा-इंसान हे ।
आगे जाके,
३
अगर इस सवाल को मे अक्सर टालता हु, या इसको अनदेखा-अनजाना करता हु; तो मे ‘दुनिया मे फसा’ हू। याने संसार मे भटक रहा हू। सुखी-दुखी हो रहा हूँ। मेरा कुछ नही हो सकता। मेरे लक्षण कुछ ठीक नही। मे बहिर्मुखी इन्सान हू।
४
अगर इस सवाल को मे सिर्फ़ पालता हू। सवाल अंदर लेके, जवाब बाहिर ढूँढ रहा हू। मतलब मुझसे जो भी दुनिया-दारी हो रही हो, वो क़ायम हे, मगर ये सवाल मेरे मन के दरवाजे पर खड़ा हे। में कभी तो कुछ करु! राह देख रहा हे। पर मे संसारी हू।जब होगा तब होगा। देखा जाएगा।
५
अगर इस सवाल को मे मिटाना चाहता हू, तो साधक हू। इस सवाल को मिटाना, याने मे को जानना, मे को पाना, खुद से मिलना मेरे जीवन का साध्य बन जाता हे, अगर में क्वचित आत्म जिज्ञासा रखता हु; सत्संग रमता हु; भीतर खोज रहा हु; तो मे ‘साधक’ हू। अब आर या पार।
६
‘स्वयं को जानना’ अगर सिर्फ़ यही एक जीवन प्रयोजन, मेरा एकमेव लक्ष्य, संपूर्ण समर्पण, मतलब अब दुनिया से कोई मतलब नही, जो होगा वो होगा, देखा जाएगा। जब मेरी अघोर साधना जारी हे, इस स्थिति मे ‘अघोर साधक’ हू। याने नित्य स्वाध्याय-उपासना-सेवा-भजन।
७
अगर मे आगम-शास्त्र-आदेश, सत्-गुरु-वचन, साधु-संत-वाणी को आत्मसात करने की क्षमता, इच्छा रखता हु, और कर रहा हु, हम से हो रहा हे। अपने हर एक अनुभूति से सीख रहा हु; तो में अघोर शिष्य हू।
८
अगर वाकई मे ‘मे’ से एकत्व, पूर्णत्व, सत् चित् आनंद स्वरूप लख जाए, तो ‘मे’ केवल परम तत्व स्पंदन हू। साक्षात परब्रह्म प्रकटीकरण ‘मे’ द्वारा हो रहा हे।
अगर सत् गुरु कृपा से, ‘मे’ स्वरूप स्थित हे , तो मे अघोर आनंद हू। जिस काम से आये थे, वो निपट गया। नैया पार। आरपार – ‘एक जबरदस्त घुमाव’। सब धन्य धन्य हे।
*
या तो मे पशु-जानवर हे, इंसान हे, जिंदा इंसान हे, संसारी हे, साधक हे, या अघोर साधक, अघोर शिष्य, अघोर आनंद हे। बस यहा तक मे की मजाल हे।
इस पश्चात असंग-अघोर-साधना।
अगर मे अंतर्मुख
बाहिर घोर हे, अंदर अघोर हे। संग घोर हे, असंग अघोर हे।
अगर ये सवाल मिट गया हे, तो संत हू।
अगर ये सवाल पूछा, तो शिष्य हू।
अगर जवाब लखाया, तो गुरु हू।
अगर बाहर ढूँढा, तो घोर हू।
अगर भीतर टटोला, तो अघोर हू।
अगर में इच्छा आकांक्षा कर रहा हू, तो में अपूर्ण हू।
अगर मे मनो कामना का पीछा कर रहा हू, तो में संसारी ।
अगर मे भोग भुगत रहा हू, तो मे
अगर में सुखी-दुखी हो रहा हू तो मे
माँ जगत तेरा संचार
भोला क्यों हो भला लाचार ।
साधक भूक-प्यास कण तरसे
माता, प्यार से सार परोसे ।
साधक भोला राम भरोसे ॥
नाम सदा में तेरे गाऊ, तेरे गाऊ
सब हे तेरा, में तुम में समाऊँ, में तुम बनजाऊ
*
कौन हू में, गुरु तुमने जगाया, स्वरूप लखाया
क्या हे दुनिया, प्रभु तुमने जताया, स्वरूप लखाया
*
दूषित मन में, तू अभेद जगाया, परमेश दिखाया
जो भी यहा, तेरी परछाया, तेरी लीला माया
*
आनंद तेरा, सनातन चेतन गीत सुनाया, गीत गवाया
गूंज रहा, एक नाद अनाहत, तेरी साद अनाहत
*
Thy call
Now & forever, be I Sing Thy sweet name.
All & everything is Yours, be I merge in Thou, I be Thou
*
Who I am…? Master, Thy grace has illuminated The Self
What is world…? Thy divine light; unfolded the essence of The Being.
*
Striking the non-difference in the impure mind, Thou reveal The Supreme Being
Whatever that is around is but Thy reflection, Thy play, Thy illuminance.
*
Thy bliss, resonated unto me, Thathat eternal aLive song, I sing along
Thathat un-struck sound&silence echoes in me as Thy calling
बम बम भोले
सब के होले
सब के बन कर
सब का भला कर
*
बम बम शंकर
सब के अंदर,
खुद को चेता कर
सब का भला कर
*
जय शंभो शंकर
सत को बया कर
जय जय शंभो शंकर
सब का भला कर
*
शंभो शंकर महादेव
बम भोले नाथ
ॐ भोले
सबके होले
मरगया बाबा हुकुम का इक्का
ऐसा ना सुना, ना ऐसे होता
अहु हुजूर हाजिर, हर पल जीता
मर नाही पाता, पर मे मरता
*
कुछ भी हो सकता
क्या पल्ले पड़ता
मर नाही पाया, पर मे मरता
मरगया बाबा, मसान रमता
~
मे मरगया बाबा
राम नाम सत्य हे, नित्य हे
इस जिन्दगीके खेल में, कुछ हार है, कुछ जीत है
सब कुछ यहा, पर कुछ नही, ऐसी अजब ये रीत है
*
क्या सही, क्या है नही, इस खोज में खोता रहा
ढूंडे कहानी अनकही, में हर दिशा जाता रहा
ऐसे जिया, ऐसे जिया जिंदगी।
*
कुछ ये किया, कुछ वो किया, अच्छा लगा अपना लिया
कुछ ये किया, कुछ वो किया, जो था गलत दफ़नादिया
ऐसे जिया, ऐसे जिया जिंदगी।
*
में कही मंजिल कही, और क्या बनी ये जिंदगी
तू सही, बस तू सही, तेरे सिवा कोई नही
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
*
इस जिंदगी के खेल में, अब क्या बचा आराम है
तू वो ही कर, जो मन में है, हर काम में फिर राम है
~
ये संसार, ये घरदार
तेरा दरबार
*
तू राह दिखाया
भजन गवाया
संत नहलाया
*
भोले वो प्यार जताया
भोला सत् गुरु पाया
~
साधक भोला सत् गुरू पाया
भोला साधक आत्म समाया
जग जा साधक
पुकार आलख
छोड दे दुनियादारी
प्रभू भजन की तुरीया न्यारी
*
साधक भोला राम भरोसे
“ अलख निरंजन, अलख निरंजन ”
नाथ पंथ आधार
*
“ उद्यम भैरव, उद्यम भैरव “
साधु संत की पुकार
~
भेद मिटाना, खुदी लखाना
आनंद जताना, ख़ुद खुशी बहाना
छोटापन मरना, दिव्य जुडजाना
खुद से बढ़कर, भव्य समाना
*
मरते दम तक, मस्त दीवाना
बार बार नही, वापस आना
गुरुचरण समर्पण, अहु अहु मिटना
रे प्यारे, एक ही बारी, पर सच्चा मरना
~
सच्चा मरना, अच्छा मरना
मरगया बाबा, जुग जुग जीना
भोग मुक्त हो जाओ
रोग मुक्त हो जाओगे
भव रोग मुक्त हो जाओ
जीवन मुक्त हो जाओगे
~
जागो साधक भोला
अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे
मौन हो जाओ, चैन में रहोगे
हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे
प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे
*
स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे
भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे
सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे
अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे
*
पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे
पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे
पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे
पागल हो जाओ, बेवकूफ़ी से बचोगे
*
{ अहु } अहं भाव { संसारी }
तेरा-मेरा, लेना-देना, सकाम-काज कुछ करता हे
खाना-पीना-सोना-उठना, वही-वही वक्त गुजरता हे
भूत-भविस-सपन-सवारे, सकल-जगत यू भटकता हे
हर बात-बात पे, सुखी-दुखी बन, सारा जीवन रोता हे
~
सब लिखा हे, सब लिखा, अहु कुछ भी ना पढ़ पाता हे
जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे
*
{ अवधू } अभाव { साधक – भक्त }
भजन-मगन, प्रभु-प्रीत-सखा बन, सहज मधुर धुन गाता हे
जो भी यहा हो, जैसा भी हे, कण-कण दर्शन पाता हे
कुछ-नाही चाहे, कुछ-नही करता, यू-ही सब हो जाता हे
अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे
~
सब लिखा हे, सब लिखा, अवधू सब पढ़ पाता हे
जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे
*
अवधू अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे
सोचो साधक भोला
क्या ही फरक पडता है?
सब कल्पना मात्र ही तो है।
बाकी है ही क्या? सोचो
*
सोचो साधक भोला
क्या ही फरक पडता है?
हम वो नही, जो जीता है।
हम खुद है, वो जिंदगी।
*
हम जीव नही, हम जीवन है।
सत् निरंतर निरंजन है॥
हम जीव नही, हम जीवन है।
हम सत् निरंतर निरंजन है॥
*
ॐ
आनन्दम
ॐ
आनन्दम
ॐ
आनन्दम
ॐ
सत् चित् आनंद
*
ॐ
आत्मानन्दम
ॐ
ब्रह्मानन्दम
ॐ
परमानन्दम
ॐ
परमशिव आनन्द
*
ॐ
स्वरूपानन्दम
ॐ
सहजानन्दम
ॐ
शून्यानन्दम
ॐ
अघोर आनन्द
*
ॐ
शान्ति
ॐ
शान्ति
ॐ
शान्ति
ॐ
तत् सत्
*
समय ३।३३ सुबह ब्रह्म-मुहूर्त
११ प्रणव + अघोर आनंद मंत्र गान
तट पश्चात १०८ प्रणव जप विधि
संन्यासी साधक हे। संसारी साधक हे। साधु साधक हे। सिद्ध साधक हे। संत साधक हे।गुरु साधक हे। शिष्य साधक हे। मुमुक्षु साधक हे। महात्मा साधक हे।
और एक बात, साधक की कोई पहचान नहीं होती। वो सब में मिला हे, पर सब के परे हे। इर्द गिर्द दिखता नहीं, पर होता हे। पागल लगता हे, पर होता नही।
आप भी साधक हो। बस साधक ही रहो। स्वानुभव से सीखो। खुद को साधो।
*
राऽम राऽम, रोम ऽ रोम, राऽम नाऽम रे।
श्री राम नाम, रोऽम रोऽम, राऽम राऽम रे॰
राऽम राऽम, पूर्ण साऽर, आऽर पाऽर रे।
श्री राम नाम, रोऽम रोऽम, आऽर पाऽर रे॰
सत्य अनुभव, नित्य अनुभूति
सनातन विभूति, परम प्रचिती
जीवन अखंड आत्म मंथन
बोलो जय अलख निरंजन
~
ॐ आदेश
जय गणेश, जय-जय गणेश, जय-जय-जय गणपति सरकार,
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार
भजे भक्तगण गणाधीश रे सेवा कर स्वीकार
*
एक प्रार्थना, एक ही विनती
सदाचार हो, ना मति भ्रांति
प्रीत हृदय हो, सत सुख शांति {हो मन निर्मल सुविचार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा कर स्वीकार}
*
आप ही तारे, आप सवारे,
आप बचाये, आप से सिखा
साधक भगत तू राह दिखाया, { हो जीवन साकार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}
भजे भक्तजन, गणपति देवा, जीवन हो साकार
*
पशु पिशाच, तोरे ही शरण हे
भूत प्रेत, सुर असुर पूजते
हर हर हर हर, हर शिवगण के {आप सुमुख सरदार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}
*
राम नाम, आदेश स्मरण हे
मंगल सुकुशल, सब पावन हे।
जग चेतन, तुमसे रोशन, जो { तेरी, कृपा, आरपार
ॐअघोरानंद, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ साद स्वाद स्वीकार}
*
मूढ जगत जब, स्वार्थ साधते
साधन सामग्री तोहे पूजते
भटके खोये, हर पल रोए, दीन हीन संसार
भजे भक्तगण, गणाधीश सब सपने कर साकार}
*
कहा पधारे, सत् गुरु आश्रम मे
श्रवण, मनन चिंतन अनुभव मे
सहज सरल ख़ुद को पहचाने {त्रिभुवन के सूत्रधार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}
*
अखण्ड जीवन स्वात्म मंथन
अलखनिरंजन अलख निरंजन
अलक्ष लक्षण गुह्य प्रकट {तू मालिक सुनो पुकार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार
*
दूषित मन जो जगत मे खोया
वो ही मन तू भजन रमाया
सब जब खोया, खुद को पाया, ऐसा) चमत्कार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार
*
अघोर भगत, तेरे भजन मगन हे
साधन काज तव भक्ति सुगम हे
दिव्य मूर्ति अखंड स्मरण {अनजाना साक्षात्कार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार}
*
साधक साधु संत भगत के,
गुरु प्रेषक, सहारा बनके
एक प्रेरणा, एक उगम {तू शक्ति मूलाधार
हो सेवा सार्थ स्वीकार}
*
सत् संग, भजन, आरती, कीर्तन,
ये जीवन प्रभुनाद सनातन
स्पंद प्रणव प्रतिसाद अनाहत, { तू महत् शून्य आकार
भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार}
*
जय माँ अघोरेश्वरी आल्हादिनी स्वतंत्र तारा,
परमेश्वरी, महादेवी, मुक्ता, (त्रिशूला) माता मधुरा
काली, दुर्गा, शक्ति, शांभवी, शिवा परापरा
*
चण्डी, चामुंडा, कपालीका, त्रिशूला (शूरा, वीरांगना)
भगवती, शांकरी, तापसी, जगत जननी
शैलजा, जया, गिरिजा, उज्वला, वंदना
परा अपरा परापरा
तुम ही, सब हो, तुमने ही सवारा
तेरी प्रीत, तेरी एक तुम हो सहारा
तेरी प्रीत, हर गीत, संगीत सतत धारा
चण्डी, महाकाली, भयभीत असुर मारा
जननी, जगत जननी, संसार जगत तारा
~
संपूर्ण मे अपरिवर्तनीय परिवर्तन – प्रकट गुह्य
EVERY POUR OF EXISTENCE IS FILLED WITH DIVINE DIVINITY.
{ राम रसायन }
RAAMA RASAAYANA.
EVERYTHING IS { राम } RAAMA.
THROUGH AND THROUGH { आरपार }.
SOLID FLUX
{ आनन्दघन }
SOLID SPACE. दिव्य द्रव्य DIVINE DIVINITY.
अघोर आत्मभान obvious internalisation
INTERNALISATION
THE SILENCE & THE SOULITUDE
आरपार
होशियार हो तड़ीपार फ़रार
लगातार बरकरार हर बार
सरकार आधार बेकार
प्यार यार संसार बलात्कार
चमत्कार निराधार लाचार
सारासार विचार सत्कार
इसपार या उसपार, जीले आरपार
निर्विकार
नमस्कार सार साक्षात्कार
कोई आर, या कोई पार,
सच्चा समझदार आरपार
जीवन-मुक्त छंद
अघोर विश्व गीत
शिव सिद्धांत
प्रत्यभिज्ञा
चिदविलास
श्री भगवानुवाच
॥ जय गुरुदेव ॥
॥ जय शंकर ॥
॥ श्री स्वामी समर्थ ॥
॥ ओम अघोर आदेश ॥
अघोर विश्व वाणी
साधक विश्व मित्र
सनातन विश्व
भोला का चेला
गुप्त कैलाशवासी
बाटली बाबा
~
मे कुछ नाही, बस मे ही मे हू
मे मरगाया, सो तू भी मरेगा
मारनेवाला मे को मिलेगा
मे मरगया बाबा
सो तू भी मरेगा
सत् गुरु न्यारा, मे को मारा । आप ने मारा, आप सहारा ॥
~
मरगया बाबा
(भीतर की ओर एक मुस्कुराती यात्रा)
हर दिन — थोड़ा और
| समझो |
हर दिन — थोड़ा कम
| उलझो |
भीतर झाँको
मूर्ख बनो — धीरे धीरे,
शांति से, आनंद में,
{ अनुग्रह में }
भीतर झाँको
खिल रहे हो,
फूल बन रहे हो,
उभर रहे हो,
बस ~ बह रहे हो —
{ सजगता में,
न कि जानने में }
भीतर झाँको
यह सब हो रहा है।
साँस चल रही हे।
अंदर और बाहर,
बिना किसी
शंका के।
खुद को बधाई दो —
{ बनने के लिए नहीं, होने के लिए }
खुद को बधाई दो —
इस अद्भुत अनुराग के लिए,
भीतरी अनुसंधान के लिए।
भीतर झाँको
तुमने खोजा हर जगह,
हर जगह खोजा —
उसे, जो तुम्हारा ही था।
और फिर पाया —
वो खोया हुआ ख़ज़ाना,
बस
भीतर झाँककर।
~
।। ॐ आनन्दम ॐ सत्चिदानंद ॐ तत् सत् ।।
साधक ~ विश्व रूप दर्शन ~ ईश्वर दर्शन ~ स्वरूप दर्शन
*
।। ॐ अघोर आदेश ।।
स्वांत: सुखाय ~ आनंद सत्संग
नाम:स्मरण – आत्मचिंतन – भजन – कीर्तन – स्तोत्रांजली – साधु संत गुरु वचन श्रवण – साधना सत्र
*
।। राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज की जय ।।
।। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
अऽउऽम
रे ऽऽ आरपारी !
*
ये जीवन हलकेमे मत लेना,
बस हलके फुलके, खुलके जीना।
*
ना फुदकना, ना मुरझाना,
थोडा मान-अपमान सहना।
॰॰। यहा सुखी-दुःखी होना, हे सख्त मना। ॰॰
*
साहस करना, भूलना-भटकना,
गलती करना, पर कभी ना दोहराना,
सदा सीखना, बासी ना होना, ताजा-ताजा रहना।
थोडा मुस्कुराना, थोडा गुनगुनाना,
खुद-खुशी बाटना, एकांत पाना।
*
बली-का-बकरा नाही बनाना
सदा मेरा-मेरा, मे-मे, ना करना,
बस ‘मे’ को पहचानना, जानना,
जाना-बनजाना।
खोजना नाही, खो-जाना।
*
कही ना अटकना, कही ना चिपकना,
कुछ भी ना करना, जो-होना वो-होना,
ना कभी पछताना, कभी ना रोना-धोना,
खुद-खुशी मे जीना।
*
श्रद्धा जपना, आत्मविश्वास रखना,
चिंता नाही, चिंतन करना,
मन-रंजन नाही, मन-मंथन करना,
कल नाही, कल-भी नाही, आज-भी नाही,
बस अभी-ही जीना।
*
स्वस्थ रहना, व्यस्त रेहना, चुस्त रहना
अल् मस्त रहना।
*
रे ऽऽ सच्चे ! समृद्ध – संतुष्ट रहना,
जीवन अपरूप गहना, ये व्यर्थ ना गवाना
जिस काम से पधारे, वो जल्द निपटाना,
और यहा से रवाना हो जाना।
*
॰॰।काम-तमाम, रोख-इनाम।॰॰
धन्यवाद कहो – दफा हो जाओ।
राऽम राऽम
कौन हे आप?
रे ऽऽ आरपारी ! एक ही पहचान हमारी, हम भोले के चेले, स्वतंत्र स्वच्छंद अकेले।
रे ऽऽ सच्चे ! स्वयं के बारेमे, स्वयं ही बतलाना, बिलकुल जरूरी नही।
दुनिया तो सवाल करेगी, तो जवाब देना जरुरी नही। पर भीतर जवाब पता होना, जरुरी हे।
सवाल कुछ नये नही, बस वही-वही, वही-वही। इन लाजवाब सवालो का कोई जवाब नही।
क्या? क्यों? कौन? कैसे? कब? कहा? ऐसे सवाल, सब बवाल। तू ना इन्हे चारा डाल, तू खुद को संभाल।
इनसे बचो। पर इन खातिर एक-बारी, स्वयं से स्वयं ही पूछ लेना। आज का सच, सच बताना। प्रश्न से मुक्त हो जाना।
रे ऽऽ सुन ! कुछ सवाल जो ‘कभी किसी से ना पूछने चाहिये’। कुछ वही सवाल जो ‘सबसे जादा पूछे जाते हे’। और उनके सच्चे जवाब – जो कभी ना देना, ये सवाल ही अटकाते-भटकाते हे।
आपका नाम क्या हे?
नाम नाम-मात्र हे, राम-नाम महा-मंत्र हे।
जो आपको जैसे पुकारे वही आपका नाम।
वो जो पुकारे भाता हे, सच्चे ! प्यार का नाता हे। जो पूरा-पूरा जीता हे, आरपार कहलाता हे।
माँ-बाप ने रखा नाम?
माता-पिता ने देह को जन्म दिया, देह को नाम दिया। वो जादा ना टीका, धुल गया। मरने से पहिले ही, पुनर्जन्म साकारा, गुरुतत्व अस्तित्व पुकारा, “ ऽऽ आरपार ऽऽ ॐ अघोरआनंद”।
असली नाम?
नकली वस्तु का असली नाम नही होता।
आप कहासे हे?
यहा से। अभी जहा हे, वहा से।
कहाके रहने वाले? पता?
अभी जहा हे, वहा! याने यहा।
आपका माँ बाप? परिवार?
सारा जगत परिवार हमारा, सनातन सत् सहारा। बाप-भोले, माँ-तारा, शिव-लोक संसार हमारा।
हम सब भूल गये।अब सब रिश्ते-नाते बस सुहृद मित्र समान लगते हे। अब कोई विशेष संबंध नही।पर सत् संबंध हे।
पर यहा कैसे?
ऐसेही भ्रमण करते, यहा पधारे। जैसे हे वैसे। ऐसे।आप का जन्म कहा, कब, क्यू हुआ? इस सवाल का जवाब नही।
आप पढे-लिखे हो? कितने पढे हे?
हम कुछ जादा ही पढे लिखे हे। इसलिए बेकार हे। हमारे लायक नौकरी-व्यवसाय अब तक पैदा ना हुए। इसलिए बेकार हे। हमारी पुश्तोंकी जायदाद हे, इसलिए कुछ नही करते। { ऐसे मत बताओ }। बताओ जितना जरुरी हे पढ़ लिये। पढ़-लिख पाते हे, हिसाब कर पाते हे। प्रभु की कृपा हे।
आप क्या काम करते हे?
हर काम करे बदनाम, भोला निरंतर निष्काम, श्रीसंतगुरुवचन अंतिम आराम, आदेश राम नाम।
{ ऐसे मत कहना }। कहना कुछ छोटा-मोटा काम कर लेते हे। बचे समय प्रभु भजन होता हे।
आप कुछ तो रोजाना काम करते होगे !?
हाँ। कुछ नही-करते, नही-करते, नही-करने मे ही, कितना कुछ हो जाता हे। जीस परिस्थिति, जिस पल, जो जरुरी हे, वो हम से होता हे। पूरी लगन से, हक से, शौक से, काम जारी हे, हम व्यस्त हे। मस्त हे। तंदुरुस्त हे, चुस्त हे। भोले जबरदस्त हे।रे ऽऽ सच्चे ! हम जिस लायक हे, वही हमसे होता हे।
आप की कमाई? खर्चा पानी? गुजारा? कैसे होता हे?
आपकी सहायता से। जिसने पैदा किया, जिसने अबतक पाला, उसकी कृपा से। वैसे अब कुछ और जरूरत नही। सत् काम जारी हे। जो हे, वो सब कुछ हे। अब जितना हे, पर्याप्त हे। अच्छे से गुजारा हो रहा हे। दुनिया पे बोझ नही हमारा, ना दुनिया हम पे बोझा हे।
आपका धर्म? और जाती?
सनातन मनुष्य धर्म, जाती और जीवन।
क्या आप अध्यात्म मे हे?
आपके गुरु कौन हे? कहा हे? क्या वो जिंदा हे? क्या उनसे बात हो सकती हे? क्या उन्हे मिल सकते हे?क्या आप उन्हे अक्सर मिलते हे?
ॐ सच्चे! स्वच्छंद नाथ गुरु-तत्व हे। गुरु-नाम, किसी देह का नाम नही। गुरु कोई देह नही, वो साक्षात् तत्व हे। अपने हर अनुभव से सीखने की, और सीखी जीवन मे उतारने की, जो असीम शक्ति हे, वह गुरु अनुग्रह हे। गुरु-बिन ये नामुमकिन हे।
शिष्य के हृदय, गुरु प्रकट होते हे। गुरु कुछ सिखाते नही, शिष्य गुरुसे सिखता हे। शिष्य का महत्व हे। अगर शिष्य सक्षम हो, तो जगत मे ऐसी कोई ताकत नही, जो आपको स्वयं परिचय से रोक पाए। गुरु वचन सत्य वचन।
रे ऽऽ सच्चे ! शिष्य गुरु से चिपकते नही, और गुरु चिपकने देते नही। हम कच्चे गुरु के चेले नही, जो की सत् गुरु कच्चा होता ही नही, वो तो पक्का पका, ताजा ज्ञानामृत हे। गुरु-शिष्य एक ही चैतन्य हे। वही एक, गुरुपद धारण किए अनुग्रह कारक हे, और वही शिष्यबन गुरुआदेश श्रवण ग्राहक हे। सब एक ही हे, मानो दो में बटा नजर आता हे। गुरु-शिष्य ये रिश्ता नही, यह निष्काम प्रेम का नाता हे, जो एक दूसरेको जखड़ता नही, उलझाता नही बलकि असंगता, स्वतंत्रता से सहज सुलझाता हे।
गुरु सेवा? गुरु दक्षिणा?
सच्चे! गुरुवचन-सत् वचन मानकर, फिर जानकर, फिर परिधानकर, सहज-सावधान, सदा-चेतन, जीवन अनुभव, जो स्वानन्द की अभिव्यक्ति हो। ऐसा स्वात्मभान ही सत् सेवा हे। सच्चे! सत् गुरु कोई सेवा-दक्षिणा लेते नही। सत् शिष्य सेवा जताते नही।
रे सच्चे! सदा साधक रहो, कभी किसके गुरु मत बनो, मार्ग-दर्शक भी ना बनो। बस मित्र भाव से रहो, समत्व भाव से रहो।
इस गुरु-शिष्य झमेले मे उलझो मत। कही किसी गुरु या आश्रम से बन्धो मत। आजीवन साधक हो, साधक ही रहो। असंग रहो, स्वतंत्र रहो। बलकि इस बारेमे, बात भी मत करो, और मत सोचो।
कुछ कल बीते बुरे कर्मो का बोझा?
नही। जो कुछ अच्छा बुरा अज्ञानी से हुआ, सब धूनी भस्म हो गया। साथ साथ अज्ञानी कर्ता भी भस्म हो गया। पर सीख भस्म ना हो पाई, सदा चेतन हे। जो अच्छा बुरा काम हुआ, सो हुआ। पर अपने गलती से सीखा, और वो गलती वापस ना दोहराई। अब ना कोई बोझा, ना ही कोई गधा।
कुछ आनेवाले कल की चिंता?
नही। कोई चिंता नही। जैसे चीताह मुर्दा जलाती, वैसे चिंता जिंदा जलाती। इस पल मे पूरा-पूरा जी लेते हे। ऐसे पल पल जो खिलता हे, गाता हे, झूमता हे। जो स्वस्थ हे, व्यस्त हे, चुस्त हे, मस्त हे, जबरदस्त हे, वो जीवन हे। हम जीव नही, हम जीवन हे। सत् निरंतर निरंजन हे।
शिवलोक! कहा?
जहा अपरिवर्तनीय-परिवर्तन। वैराग्य-ऐश्वर्य उन्मिलन। ज्ञान-भक्ति सम्मेलन। साक्षात शिव-शक्ति आंदोलन।
एक जो मानो दो मे बटा। पर बटा नही, एक ही समाया। स्वच्छंद स्वतंत्र असंग अलमस्त।
अलख निरंजन
अऽउऽम
रे ऽऽ सच्चे ! सही जगह पधारे।
ऽऽ आरपार ऽऽ एक जबर सत् घुमाव ऽऽ एक दिन मे नही सही, एक दिन प्रभु कृपा से हो जाता हे।
ये साधक जीवन एक अखंड परिक्रमा हे, अघोर-आनंद यात्रा हे। बस इस रास्ते चलते चलो। इस राह पे डटके चलना, ही अंतिम मुकाम हे।
ये सबके बस की बात नही। हम उसे नही, वो राह हमे चुनती हे।
सब लिखा हे, अगर ऽ कोई ऽ पढ़ लिया।
वो रस्ता दिखाया, अगर ऽ कोई ऽ चल दिया।
जो जान पाया, जान पाया। जो डूब गया, सो बचगया ।॰
जो मिला खुद-से, खुद-को, जैसे के तैसे ऽऽ आरपार ऽऽ, वह अघोर-आनंद समाया।
बाकी सब अपने-अपने जगह ठीक हे, पर उन-उस सब में वो बात नही, वो बस ऊपरी-ऊपर हे, पर अपार-अपरमपार, ऽऽ आरपार ऽऽ नही।
रे ऽऽ सच्चे ! सदा सावधान, इक-पल ना छूटे आत्मभान।
॰॰। कच्चा मोह-संसार, सच्चा ऽऽ आरपार ऽऽ ।॰॰
जय हो ! सच्चे की।॰
“इस यात्रा मे आपका सदा स्वागत हे।”
एक जबरदस्त घुमाव
साधक नित्य-नूतन जीता हे, ये यात्रा अखंड हे।
साधक स्वयं एक अनुभव-शृंखला से गुजरता हे, हर अनुभव कुछ सीखता हे। जो जाना, बन जाता हे। ये सत्संग-चर्या, साधक स्वयं की जरूरत, मोहब्बत हे। हसते-गाते वक्त अच्छा गुजरता हे। सब अघोर आनंद भजन साधन हे।
ये साधन-चर्या स्वयं अनुस्मारक हे। ये ‘सत्संग-साधन-शृंखला‘, पूज्य सत्गुरु प्रसाद हे।
तथा साधु-संत-परम-परा-वाणी, सत्-गुरु सत्-वचन की गूंज हे। जो हृदय से आरपार होके, अस्तित्व से टकराती हे। सब मोह मिटाती हे, खुद को-खुद से मिलाती हे। अब अस्तित्व का अलग से कोई नामो निशान नही। सब आरपार।
साधक जब सत्-गुरु अनुग्रह अपार-कृपा-प्रसाद पाता हे, गुरु-मंडल गुरु-तत्व जुड जाता हे, सब धन्य-धन्य हो जाता हे। स्वयं में एक अपूर्व अमुलाग्र बदलाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।
जीवन मे एक ज़बरदस्त घुमाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।
॥ स्वान्तः सुखाय। ओम नमः शिवाय ॥
ॐ अघोर आनंद
आरपार आदेश
~
॰॰॰ ॐ आनंदम् ॰ ॐ सतचिदानंद ॰ ॐ तत सत ॰॰॰
सब तेरा
.
ये जमी या आसमा
ये हर दिशा तेरी
.
ये रंग भी सुगंध भी
खुली हवा तेरी
.
ये चन्द्रमा ये तारका
ये सूर्य भी तेरा
.
ये कारवा ये पासबा
ये गुलसिता तेरा
.
ये जिंदगी तेरेनाम हे
ये रोशनी तेरेनाम हे
.
ये ख्वाइशे ये चाहते
ये मुश्किलें तेरी
.
ये सुकून ये शांतता
ये दर्द भी तेरा
.
मेरा मन मेरी घडन
जो हे मेरा तेरा
.
ये आत्मा शरीर भी
ये जीवन तेरा
.
ये जिंदगी तेरेनाम हे
ये रोशनी तेरेनाम हे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…
राधेशाम
.
पानी में मछली बने
तू पंछी बने आसमा में
लाखो हे रूप तेरे
तू ही हर दिशा इस जहा में
राधेशाम राधेशाम
.
में जी रहा हु इस माया नगरिया में
तेरी परछाई मेरी छाव हे
अब तुझसे में क्या सब छुपाऊ
तुनेही लिखी ये कहानी
में खुदसे यु अब न जी पाउ
तेरे नाम हे जिंदगानी
.
अंधेरोमे सूरज बने
तू पानी बने रेगिस्तान में
तू धुप में तरुवर बने
तुही हर दिशा इस जहामे
राधेशाम राधेशाम
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘हरिहर हरिहर’
काम जारी हे…
भोलेनाथ तेरेसाथ
.
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
तू ना पाना खुद को अकेला
तनहा बेघर अनाथ रे
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
.
भोले बिना, क्या सुखदुख तू जाना,
क्या जीवन तूने जिया रे
शिव के बिना, क्या समझ क्या पाया,
क्या अमृत तूने पिया रे
.
भोले हे साथी, भोले सखा हे
भोले हे साथी, भोले दवा हे
भोले समंदर, भोले समां हे
तेरे उल्झनोकि भोले दुवा हे
भोलेही शिव हे, भोले सखा हे
.
अगर तू दुखी हे, अगर तू खफा हे
अगर तू हे कातिल, अगर तू बुरा हे
अगर तू हे खोया, अगर तू हे डूबा
अगर तेरी राहोपे कठिनाइया हे
अगर तेरी आखोपे छाया अँधेरा
मन तेरा चंचल हे माया में खोया
भोले की मंदिर में भक्तोका मेला
तू ना पाना खुद को अकेला
.
तू ना पाना खुद को अकेला
तनहा बेघर अनाथ रे
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘हरिहर हरिहर’
काम जारी हे…
बारिश ना हुआ
.
बारिश ना हुआ
रुखी सुखी हवा
देखो, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
कब हम जगेंगे?
जब टूटेगा सुंदर सा सपना?
कब कुछ करेंगे?
जब देखे कोई मरता अपना?
.
देरी ना हो जाए
हम चाहे बत्ती जलाए
अंधेरो मै माचिस धुंडते धुंडते
देरी हो न जाए
.
जब रोशनी हे
तभी जानले आनेवाला कल
या लाशे पड़ी हे
तू उनमे पहेचानले अपनी शकल
.
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
खेतोमे बैठे किसान
भीगी आखे देखे आसमान
बस रोटी, कपडा और मकान
पर जीना यहाँ नही आसन
.
हर योजना हे सफल
पर खेतो न उगती फसल?
जमीनों पानी भी न लगा
जब किसानो ने खोदा कुआ
.
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
कभी, कही, किसीने कहा
समझो अन्तिम घड़ी मै गुजरता जहा
जब पानी की हो आनीबानी
अधूरी हे हर एक कहानी
.
देखो, क्या हमने पाया?
कठिनाई और बद दुआ
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
चातक मर गया
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘सब (कुछ) नहीं’
काम जारी हे…
सुख दुःख
.
थोडा सुख होना
थोडा दुःख होना
जो भी होना अच्छा होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
ये कैसी कैसी दुनिया
ये क्या हे दुनियादारी
ये कैसे रिश्ते नाते
ये कैसी मारामारी
.
सब झूटी झूटी दुनिया, ये झूटी दुनियादारी
सब झुटे रिश्ते नाते, ये कैसी मारामारी
जो सिनेमे कटारी होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
हे झूटी मेरी बाते
झूटे हे इरादे
झूटी मेरी चाहत
और झूटे मेरे सपने
.
हे झूटी मेरी बाते, सब झूटे हे इरादे
झूटी मेरी चाहत, और झूटे मेरे सपने
मेरे सपने सच ना होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
ना कोई मेरा अपना
ना कोई हे पराया
तनहाई ने सिखाया
बस तू और तेरा साया
.
ना कोई मेरा अपना, ना कोई हे पराया
तनहाई ने सिखाया, बस तू और तेरा साया
अन्धेरोमे साया भी खोनारे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
थोडा सुख होना
थोडा दुःख होना
जो भी होना
अच्छा होना रे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…
दिल पतंग
.
दिल पतंग दिल पतंग
आसमान में उड़े जा रहा हे
भूल जा हर दिशा
हर दिशा नशा छा रहा हे
.
ये हवा संग तेरा तन चले जहा
आसमान में उड़े जा रहा हे
भूल जा हर दिशा
हर दिशा नशा छा रहा हे
में तेरेबिना कैसे जीना
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
तू नाही कोई नाही
कोई नाही तेरेबिन
.
दिन नाही शाम नाही
रैन नाही तेरेबिन
.
सुख नाही दुःख नाही
चैन नाही तेरेबिन
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
बिन तेरे दिल की नदिया बहती नहीं हे
बिन तेरे मन की चिड़िया गति नहीं हे
.
बिना तेरे चैनं की निंदिया क्या सोउ
बिना तेरे नैनं क्या सपने दिखाऊ
.
बिना तेरे गीतोके स्वर कैसे गाऊ
बिना तेरे हर पल में कैसे बिताऊ
.
बिना तेरे मन को मेरे कैसे समझाऊ
बिना तेरे जीवन का मतलब क्या पाऊ
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
तू नाही कोई नाही
कोई नाही तेरेबिन
.
दिन नाही शाम नाही
रैन नाही तेरेबिन
.
सुख नाही दुःख नाही
चैन नाही तेरेबिन
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…
जीवनशाला
.
जो तुम चाहो
वो मिल जाए
सच्ची हो अगर सदा
मेरे मन ने
ये जाना हे
किया हे फैसला
तू जानेगा, तू मानेगा
तू सीखेगा, ये जीवनशाला
.
तनहा भटकना
माथे पसीना
ऐसी कठोर जिंदगी
.
धुप में थकना
छाव में रुकना
ऐसा सफ़र जिंदगी
.
हर पल जो गुजरा हे
मन में वो उतरा हे
कुछ अच्छा हे कुछ बुरा
ये हे जीवनशाला
.
मन से सब बाते
होती रहती हे
मन ही हे साथी अभी
मन ये सब जाने
सब सही पहचाने
मन गाफिल न करना कभी
.
ये सारा मन का हे खेल
जीवन सुख दुःख का मेल
.
इन बातोका सिलसिला
ये हे जीवनशाला
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘सब (कुछ) नहीं’
काम जारी हे…
जाना बनजाना
.
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
.
यु लाखो सपने लेके
यु लोग चल रहे हर दिशा
हर दिशा कम पड जाए
अगर तू ढूंडे जो तेरे भीतर हे बसा
वो तो तेरे भीतर ही हे
वो तो तेरे भीतर ही हे
तेरा मन क्यू मानत नाही
तेरा दिल क्यू जानत नाही
ऐसी मज़बूरी में
कौन जिया कौन जिया
.
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
.
तू खो न जाना
जो मिला
वो बेशक खो देना
फिर कुछ नया पाना
ये पाना खोना
खेल खेलना
.
पर खुद न खोना
इस मायाजाल में
तू खो न जाना
तू खो न जाना
.
माटी मन बर्तन बनजाना
तेरा नाम में हर पल गाना
दूषित मन निर्मल बन जाना
मन जो जाना वो बनजाना
.
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह \’जाना – बनजाना\’
काम जारी हे…
एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।
{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}
बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?
साधक: जी बोलिए, महाराज।
बुढ़ाऊँ: आप का नाम?
साधक: साधक भोला राम भरोसे
बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?
साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।
बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।
साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।
बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?
साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।
बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।
साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?
बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।
साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।
{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}
बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?
साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।
बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?
साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।
बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।
साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।
बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!
साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?
बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।
साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?
बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।
साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।
शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।
बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?
एक बारी अर्ज़ तो करो
आपके दिल में क्या हे।
आप के ही इशारो से
साधक जीवन जिया हे॥
ऐसे अदभुत राक्षस है
रावण पेश आते है।
दुनियादारी की आवेश में
दिल से राम नाम गाते है॥
*
हम कैसे हे?
आप ने बोहोत बारी पूछा हमें।
हम कुछ बता ना पाएँ
और भूल भी गये पूछना
आप कैसे हो भाई!
ये भूल भी क्या चीज है भोले
भूल से ही भूल जाते है॥
निकम्मे है, कुछ करने को नहीं
तो जाम बनाते है
बीड़ी जलाते है
तेरा नाम गाते है।
खुद को खुद ही भुला बैठे
अब बदनाम कहलाते है।
ये भूल भी क्या चीज है भोले
भूल से ही भूल जाते है॥
इस क्षण
कितना सुकून हे,
शांति हे, आनंद हे
ये क्षण स्वयं सम्पूर्ण हे।
इस पल के परे
कहा हे ज़िन्दगी?
जीवन मुक्ति का रहस्य
इस पल में छुपा हे।
आसमान में लाख है तारे
उन सब में दिखते चेहरे तुम्हारे
मूढ़ भगत जब मती मन खोवे
तोरे दर्शन तब सुध बुध पावे
तोरे नाम प्रीत स्वर गावे
वो उन्मन मंदिर बन जावे
रघुपती तुम बीन कैसे संवारे
जीवन नैया पार पधारे
आसमान में लाख है तारे
उन सब में दिखते चेहरे तुम्हारे
अंदर बाहिर कुछ नहीं होना
अंदर बाहिर सही पहचाना
ख़ुशबू सच हे फूल बहना
अंदर सच हे बाहर आइना
अंदर बाहिर एक ही हो जाना
मन मती जीवन माटी होना
खुद की छबी को खुद ही मिटाना
पा के खोना, खो के पाना
एक ही जनम में अनंत मिल जाना
कभी ना भूलो भूलना खुद को
कभी ना जीना खुद का जीना
सब सच संचित समय परे हे
समय समय ना सच को भुलाना
प्रति दिन जीना
प्रति दिन मर जाना
प्रति दिन जगाना
प्रति दिन सो जाना
जिये जिये संसार जिये क्या?
कर बैठे व्यापार रे
~
लाखों शब्द हे
एक हे।।।याद हे??
पहिले तो वह बस ही गये हम थे,
जो न हमारा धाम हे।
मद मस्त सयाने खुद को कहकर,
करते जो न हमारा काम हे।
असुरा वृत्ति, बेसुरा वाणी
नारी नशा आराम हे
वो जो सर्वत्र है, और हे नही
वो सदा यह ही था।
वो भूलसे,
खुद को भूल जाता है
उसका जन्म होता है
वो नाम रूप पाता है।
जो जाना है,
वो जीता है
जब सीखे वो हर पल
तब साधक कहलाता है।
जग जाता है, जागता है, जगाता है।
हिसाब के परे जीता हे।
जीवन संगीत गाता हे।
~
“जो जाना, वो बन जाना
अब कही ना आना जाना।”
~
“जो ज्ञान वो जीवन उतरा
वो ज्ञान से राह मिलेगी।”
~
“जब हृदय प्रभु प्रीत खिलेगी
तब प्रेम की नदी बहेगी।”
~
अरे सुन, प्रभु भजन मगन दीवाने
हम जाने तेरे बहाने।
*
हर समस्या के पीछे कोई व्यक्तित्व होता है।
जब ये व्यक्तित्व ही मिट गया तो कैसी चिंता?
किसको चिंता?
फिर क्या बाक़ी ?
फिर चिंता नहीं।
चिंतन सही
अखंड प्रभु चिंतन।
अनुभूति समुद्र मंथन।
*
कुछ नहीं बचेगा।
आप भीनहीं बचोगे।
न साधना, ना साध्य, ना साधक
सब विलीन हो जाएगा
दूजा तो अब कुछ रहा ही नहीं
और क्या ही कुछ रहा सही?
*
ये अब तक कोई किसी को,
लब्जों में न बता पाया।
वो कोशिश करता रहा
वो जताने की
*
वो जीवन संगीत बन गया
चरित्र साधु साधु हो गया
जो जो अपनाया सब चला गया
अपनापन भी चला गया
*
गुरु कृपा असीम अपार है
गुरुजन प्रेम चमत्कार है
*
आत्मचिंतन ही परमेश चिंतन
आत्मज्ञान ही परमेश ज्ञान
आत्म कृपा ही परमेश कृपा
दो कहा है?
आप जहा जैसे हो इस वक्त
उसके परे कोई स्वर्ग नही
*
अगर
आप जान पाओ
तो
मुमकिन है
*
नही जान पाओ
तो
मुश्किल है
*
ऐसा ही है
ये दुनिया नश्वर है
इसमे अपना दम ना घुटाओ
गहरा दम लगाओ
सदा आनंद में रहो
*
विधि निषेद की विधि
विधि निषेद का निषेद
ये हे
साधक भोले
जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।
जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?
जाग जा साधक, जग जा साधक,
यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,
हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।
~
भोग मुक्त हो जाओ
रोग मुक्त हो जाओगे ।
भव रोग मुक्त हो जाओ
जीवन मुक्त हो जाओगे॥
*
अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे
मौन हो जाओ, चैन में रहोगे।
हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे
प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे॥
*
स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे
भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे।
सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे
अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे॥
*
पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे।
पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे॥
पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे।
पागल हो जाओ, मारामारी से बचोगे॥
*
सवाल एक ही था, एक ही है, एक ही रहेगा।
मै कौन हूँ? दुनिया क्या है?
यहा क्या हे मेरा वास्ता?
क्या हे वो रास्ता?
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भगवान है? नही?
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अगर है ही नही भगवान
तो बस बने रहो इन्सान।
भोग मगन हैवान
चंद पल के मेहमान।
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मानो वो है।
तो क्या है वो?
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जवाब एक ही है
मै हूँ।
बस हूँ।
कुछ नही, कोई नही, कभी नही।
सब कुछ, हर कोई।
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जरा सोचो साधक भोला
कर ले खुद, खुद की पहचान
कितना जीया बने अंजान
तू तो अपने घर मेहमान
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पता ज़रूरी हे
काम जारी हे
सब व्यसन हे।
अच्छाई बुराई;
सब व्यसन हे।
अर्थ परमार्थ;
सब व्यसन हे।
कला स्वार्थ;
भलापन बुरापन;
बुढ़ापा बचपन;
सब व्यसन हे।
श्रद्धा साधन;
आत्मक्लेश परमेश;
जानना बनना;
सब हे, कुछ नहीं ;
में हू, जगत हे;
कृष्ण, राम, शिव, ब्रह्मा
सब व्यसन हे।
जताना, निभाना;
मौज भजन गाना;
सब व्यसन हे।
कल जो मंदिर मेखाना नजर आता था,
आज वो मेखाना मंदिर नजर आता हे।
अब साला व्यसन ही खुद में जीता हे।
पियक्कड़ साधक भोला, रात दिन पिता हे।
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काम जारी हे।
असुविधा के लिये खेद हे।