जीवनमुक्तछन्द

भोलेनाथ तेरेसाथ

भोलेनाथ तेरेसाथ
.
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
तू ना पाना खुद को अकेला
तनहा बेघर अनाथ रे
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
.
भोले बिना, क्या सुखदुख तू जाना,
क्या जीवन तूने जिया रे
शिव के बिना, क्या समझ क्या पाया,
क्या अमृत तूने पिया रे
.
भोले हे साथी, भोले सखा हे
भोले हे साथी, भोले दवा हे
भोले समंदर, भोले समां हे
तेरे उल्झनोकि भोले दुवा हे
भोलेही शिव हे, भोले सखा हे
.
अगर तू दुखी हे, अगर तू खफा हे
अगर तू हे कातिल, अगर तू बुरा हे
अगर तू हे खोया, अगर तू हे डूबा
अगर तेरी राहोपे कठिनाइया हे
अगर तेरी आखोपे छाया अँधेरा
मन तेरा चंचल हे माया में खोया
भोले की मंदिर में भक्तोका मेला
तू ना पाना खुद को अकेला
.
तू ना पाना खुद को अकेला
तनहा बेघर अनाथ रे
भोलेनाथ तेरेसाथ हे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘हरिहर हरिहर’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

बारिश ना हुआ

बारिश ना हुआ
.
बारिश ना हुआ
रुखी सुखी हवा
देखो, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
कब हम जगेंगे?
जब टूटेगा सुंदर सा सपना?
कब कुछ करेंगे?
जब देखे कोई मरता अपना?
.
देरी ना हो जाए
हम चाहे बत्ती जलाए
अंधेरो मै माचिस धुंडते धुंडते
देरी हो न जाए
.
जब रोशनी हे
तभी जानले आनेवाला कल
या लाशे पड़ी हे
तू उनमे पहेचानले अपनी शकल
.
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
खेतोमे बैठे किसान
भीगी आखे देखे आसमान
बस रोटी, कपडा और मकान
पर जीना यहाँ नही आसन
.
हर योजना हे सफल
पर खेतो न उगती फसल?
जमीनों पानी भी न लगा
जब किसानो ने खोदा कुआ
.
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
.
कभी, कही, किसीने कहा
समझो अन्तिम घड़ी मै गुजरता जहा
जब पानी की हो आनीबानी
अधूरी हे हर एक कहानी
.
देखो, क्या हमने पाया?
कठिनाई और बद दुआ
बारिश न हुआ
रुखी सुखी हवा
देखा, क्या हमने पाया
चातक मर गया
चातक मर गया
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘सब (कुछ) नहीं’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

सुख दुःख

सुख दुःख
.
थोडा सुख होना
थोडा दुःख होना
जो भी होना अच्छा होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
ये कैसी कैसी दुनिया
ये क्या हे दुनियादारी
ये कैसे रिश्ते नाते
ये कैसी मारामारी
.
सब झूटी झूटी दुनिया, ये झूटी दुनियादारी
सब झुटे रिश्ते नाते, ये कैसी मारामारी
जो सिनेमे कटारी होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
हे झूटी मेरी बाते
झूटे हे इरादे
झूटी मेरी चाहत
और झूटे मेरे सपने
.
हे झूटी मेरी बाते, सब झूटे हे इरादे
झूटी मेरी चाहत, और झूटे मेरे सपने
मेरे सपने सच ना होना रे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
ना कोई मेरा अपना
ना कोई हे पराया
तनहाई ने सिखाया
बस तू और तेरा साया
.
ना कोई मेरा अपना, ना कोई हे पराया
तनहाई ने सिखाया, बस तू और तेरा साया
अन्धेरोमे साया भी खोनारे
.
में तेरे लिए गाऊ
तेरा बन जाऊ
ऐसी जिंदगानी जीना रे
.
थोडा सुख होना
थोडा दुःख होना
जो भी होना
अच्छा होना रे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

दिल पतंग

दिल पतंग
.
दिल पतंग दिल पतंग
आसमान में उड़े जा रहा हे
भूल जा हर दिशा
हर दिशा नशा छा रहा हे
.
ये हवा संग तेरा तन चले जहा

तू वहां जाएगा
ये घटा संग तेरा मन चले
तू वहां जाएगा
.
जो जमी पाएगा
वो तेरा जहा बन जाएगा
पर अगर पर झड जाए
तो ये हवा… कुछ कर न पाए
.
दिल पतंग दिल पतंग

आसमान में उड़े जा रहा हे
भूल जा हर दिशा
हर दिशा नशा छा रहा हे

.
दिल तरंग दिल तरंग
जल जल में खिले जा रहा हे
हर लहर हर लहर
हर सफ़र में नशा हो रहा हे
.
जो मिला … तू भीतर समाना
जो समाया …  वो तू बन जारे
खुद की खोज में तू बेह जाए
खुद से मिल तू खुश हो जाए
.
दिल तरंग दिल तरंग
जल जल में खिले जा रहा हे
हर लहर हर लहर
हर सफ़र में नशा हो रहा हे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…
जीवनमुक्तछन्द

में तेरेबिना कैसे जीना

में तेरेबिना कैसे जीना
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
तू नाही कोई नाही
कोई नाही तेरेबिन
.
दिन नाही शाम नाही
रैन नाही तेरेबिन
.
सुख नाही दुःख नाही
चैन नाही तेरेबिन
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
बिन तेरे दिल की नदिया बहती नहीं हे
बिन तेरे मन की चिड़िया गति नहीं हे
.
बिना तेरे चैनं की निंदिया क्या सोउ
बिना तेरे नैनं क्या सपने दिखाऊ
.
बिना तेरे गीतोके स्वर कैसे गाऊ
बिना तेरे हर पल में कैसे बिताऊ
.
बिना तेरे मन को मेरे कैसे समझाऊ
बिना तेरे जीवन का मतलब क्या पाऊ
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
.
तू नाही कोई नाही
कोई नाही तेरेबिन
.
दिन नाही शाम नाही
रैन नाही तेरेबिन
.
सुख नाही दुःख नाही
चैन नाही तेरेबिन
.
में तेरेबिना कैसे जीना
तेरेबिना कैसे जीना ?
तेरेबिना कैसे जीना
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

जीवनशाला

जीवनशाला
.
जो तुम चाहो
वो मिल जाए
सच्ची हो अगर सदा
मेरे मन ने
ये जाना हे
किया हे फैसला
तू जानेगा, तू मानेगा
तू सीखेगा, ये जीवनशाला
.
तनहा भटकना
माथे पसीना
ऐसी कठोर जिंदगी
.
धुप में थकना
छाव में रुकना
ऐसा सफ़र जिंदगी
.
हर पल जो गुजरा हे
मन में वो उतरा हे
कुछ अच्छा हे कुछ बुरा
ये हे जीवनशाला
.
मन से सब बाते
होती रहती हे
मन ही हे साथी अभी
मन ये सब जाने
सब सही पहचाने
मन गाफिल न करना कभी
.
ये सारा मन का हे खेल
जीवन सुख दुःख का मेल
.
इन बातोका सिलसिला
ये हे जीवनशाला
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘सब (कुछ) नहीं’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

जाना – बनजाना

जाना बनजाना
.
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
.
यु लाखो सपने लेके
यु लोग चल रहे हर दिशा
हर दिशा कम पड जाए
अगर तू ढूंडे जो तेरे भीतर हे बसा
वो तो तेरे भीतर ही हे
वो तो तेरे भीतर ही हे
तेरा मन क्यू मानत नाही
तेरा दिल क्यू जानत नाही
ऐसी मज़बूरी में
कौन जिया कौन जिया
.
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
मन जाना वो बनजाना
.
तू खो न जाना
जो मिला
वो बेशक खो देना
फिर कुछ नया पाना
ये पाना खोना
खेल खेलना
.
पर खुद न खोना
इस मायाजाल में
तू खो न जाना
तू खो न जाना
.
माटी मन बर्तन बनजाना
तेरा नाम में हर पल गाना
दूषित मन निर्मल बन जाना
मन जो जाना वो बनजाना
.
सुध बुध मन की खोती रहेगी
ऐसी बाते होती रहेगी
तू जो जाना वो बनजाना
जाना वो बनजाना
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह \’जाना – बनजाना\’
काम जारी हे…

जीवनमुक्तछन्द

खेल

खेल
.
इस जिंदगी के खेल में
कुछ हार हे, कुछ जीत हे ।
सब कुछ यहाँ पर कुछ नहीं
ऐसी अजीबो रित हे ।
.
क्या सही क्या हे नहीं …?
क्या सही क्या हे नहीं
इस खोज में खोता रहा ।
ढूंढे कहानी अनकही
हर दिशा में जा रहा ।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ॥
.
क्यों किया ? कैसे किया ?
कुछ ये किया कुछ वो किया
अच्छा लगा अपनालिया ।
कुछ ये किया कुछ वो किया
जो था गलत दफानादिया ।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ॥
.
में कही मंजिल कही?
में कही मंजिल कही
और क्या बनी ये जिंदगी।
तू सही बस तू सही
तेरे सिवा कोई नहीं।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ||
.
इस जिंदगी के खेल में
अब क्या बचा आराम हे ?
इस जिंदगी के खेल में
अब क्या बचा आराम हे।
तू वो ही कर जो मन में हे तेरे
बस वो ही कर जो मन में हे तेरे।
.
बस वो ही कर जो मन में हे
बस वो ही कर जो मन में हे
हर काम में फिर राम हे ।
.
तू वो ही कर जो मन में हे
हर काम में फिर राम हे ॥
राम हे ।
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…
जीवनमुक्तछन्द

कैसे

जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।

जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?

जाग जा साधक, जग जा साधक,

यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,

हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।

~

अघोर आत्म मंथन आकाशविश्ववाणी जीवनमुक्तछन्द, ,

भोगंभोग

भोग मुक्त हो जाओ

रोग मुक्त हो जाओगे ।

भव रोग मुक्त हो जाओ

जीवन मुक्त हो जाओगे॥

*

अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे

मौन हो जाओ, चैन में रहोगे।

हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे

प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे॥

*

स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे

भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे।

सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे 

अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे॥

*

पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे।

पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे॥

पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे।

पागल हो जाओ, मारामारी से बचोगे॥

*

अघोर आनंद भजन जीवनमुक्तछन्द, , ,

व्यसन

सब व्यसन हे।

अच्छाई बुराई;

सब व्यसन हे।

अर्थ परमार्थ;

सब व्यसन हे।

कला स्वार्थ;

भलापन बुरापन;

बुढ़ापा बचपन;

सब व्यसन हे।

श्रद्धा साधन;

आत्मक्लेश परमेश;

जानना बनना;

सब हे, कुछ नहीं ;

में हू, जगत हे;

कृष्ण, राम, शिव, ब्रह्मा

सब व्यसन हे।

जताना, निभाना;

मौज भजन गाना;

सब व्यसन हे।

कल जो मंदिर मेखाना नजर आता था,

आज वो मेखाना मंदिर नजर आता हे।

अब साला व्यसन ही खुद में जीता हे।

पियक्कड़ साधक भोला, रात दिन पिता हे।

~

काम जारी हे।

असुविधा के लिये खेद हे।

जीवनमुक्तछन्द,

क्या मिलेगा?

अगर में ये करुंगा!

तो मुझे क्या मिलेगा?

कब मिलेगा?

{सारा जीवन कुछ पाने में बीत गया}

*

अभी ये सोचो

अभी क्या हे मेरेपास?

क्या दे सकता हू?

कैसे दे सकता हू?

{ये तो बस शुरुआत हे}

~

खुश रहो यार

जीवनमुक्तछन्द, ,

अपना कुछ भी नहीं

जो होना हे

हो रहा हे।

आना जाना।

अपना कुछ भी नहीं।

ना हमने कुछ किया हे।

ना कुछ कमाया हे।

जो आपका हे, वो आपका हे।

जो नहीं हे, वो नहीं हे।

ये दुनिया एक सुंदर बगीचा हे।

करोड़ों फूल खिलते हे यहाँ।

मुरझाते भी हे।

अपना कुछ नहीं।

सब हो रहा हे।

एक सास अंदर 

एक सास बाहर

आप जी रहे हो।

वो जीवन भी आपका नहीं

सब हो रहा हे।

अपना कुछ नहीं।

*

जो अपना हे नहीं

वो अपना समझो मत

उसका मालिक ना बन।

नहीं तो वो चोर कहलाए।

वैसे डकैत तो हो ही आप

जो देह भी अपना नहीं 

उसे खुद मानके चले

चोर कहिके।

अपना कुछ नहीं।

~

अघोर आत्म मंथन जीवनमुक्तछन्द, , ,

उद्यमो भैरव:

\"\"
।।ॐअघोरआदेश।।

*

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

*

अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन आकाशविश्ववाणी जीवनमुक्तछन्द, , , , ,

काम जारी हे

जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?

अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।

*

अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?

और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?

*

कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।

कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥

*

कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।

ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥

*

बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई

फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई

*

अब, जागो साधक प्यारे

बाद में क्यू पछता रे?

*

एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।

तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥

अघोर आनंद भजन आकाशविश्ववाणी जीवनमुक्तछन्द, , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु भजन में हे,

जो आनंद तत्व चिंतन में हे,

जो आनंद विषय त्याग में हे {वो भोग में नहीं},

जो आनंद एकांत में हे {संग में नहीं},

*

जो आनंद ध्यान में हे,

जो आनंद मौन में हे,

वो सहज आनंद,

हम से हे, हम में हे, हम ही हे।

*

वो सहज आनंद अपना स्वरूप हे।

वो आनंद राम मय हे।

वो राम आनन्दमय हे।

वो राम ही स्व स्वरूप हे।

*

जगत में हम नहीं, जगत हम में हे।

हम हमेशा हे थे रहेंगे।

हमारा कुछ नहीं।

सब कुछ राम हे।

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे।

अघोर आत्म मंथन आकाशविश्ववाणी जीवनमुक्तछन्द, ,

ओ साधक प्यारे!

ज्ञान भक्ति के पर फैलाकर,

स्वरूप गगन में उड़ज़ा साधक।

*

आत्म कृपा की धूनी चिताकर,

सत्संग भजन में रमजा साधक।

*

राम नाम की अलख लगाकर,

महत शून्य में खोजा साधक।

अघोर आनंद भजन आकाशविश्ववाणी जीवनमुक्तछन्द, ,
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