प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।
भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।
जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।
धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।
॥ ओम अघोर आनंद ॥
साधक
सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।
शिव – चित् + आनंद शक्ति
चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।
शिव शिव शिव कल्याण करी ।
चित्-विलास = आरपार
