सून कपालिका, मेरे खप्पर यारा,
हम माने या ना माने, जाने या ना जाने, हम तो सनातन अघोर साधक है। बस हम भूल चुके हे इस सनातन सत्य को, और यह वहाँ भटक रहे हे, स्वयं की खोज मे। दादाजी की ऐनक; कहानी तो सुनी होगी। प्यारे, अभी कुछ नही बिघड़ा, बस खुद को जगाना हे, याद दिलाना हे। सत्य भीतर दोहराना हे। निर्भय स्वर लगाना हे।अघोर भजन गुनगुनाना हे। युगन युगन हम योगी, हा योगी।अवधूता
यह नाथ भजन, अघोर साधक की आत्म-कहानी हे। ये शब्द, ये धुन अघोर साधक को, इस आनंद यात्रा में एक चैतन्य प्रदान करती अकाट्य जोश पैदा करती हे। जोश में होश बरकरार रख अघोर साधक तत्व चिंतन मगन, निरंतर स्वरूप पथ ही अपनाता हे। सत् गुरु ज्ञान प्रसाद संस्मरण, स्वयं प्रकाश मैं अघोर सत्य लखाता हे। अवधूता, युगन युगन हम योगी।
ओम,
अघोर आनंद
काम जारी हे। ना रुकावट, ना खेद।
