अघोर आत्म भान

त्याग

Can you?

YES.

*

What really belongs you, that you can give up on!?

And WHO is giving up? what? Why?

*

We are empty. SOLID SPACE.

my fr!end.

{गुरूवचन सत्यवचन}

*

One thing to give up,

is the very thought of giving up!

*

KNOW Nonsense, NO Nonsense!

*

Relax!Max

*

Giving up! ये बस एक मन की खुजली हे!

साधक को ये बात सुलझी हे।

यहाँ अपना कुछ हे ही नहीं।

क्या त्याग करोगे?

*

बस त्याग के काबिल बनो,

जो जाना हे चला जाएगा,

जो रेहना हे रहेगा।

बस त्याग के काबिल बानो,

तब खुद का भी त्याग होगा।

कुछ छोड़ना, पाना नहीं,

जो चल रहा हे सब सही।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, ,

ऐसा सब

अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी

वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।

ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,

अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।

*

अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।

हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।

कुछ पाना खोना नहीं।

कही आना जाना नहीं।

कोई अपना पराया नहीं।

सब एक हे।

*

स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।

दुनिया बस मन की भ्रांति हे।

मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।

अब कुछ फरक नहीं पड़ता।

~

MIND BLENDING,

MIND BENDING!

MIND ENDING.

“MIND yo!ur MIND”

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

केवल परमार्थ

अभेद भक्ति सावध । साक्षात सत्गुरु सत्संग ।

सृजन नित्य असंग । साधके भजन अभंग ।।

*

विरागी शुद्ध मनन । स्पष्ट स्वरूप चिंतन ।

जीवन मुक्त दर्शन । साधके अघोर साधन ।।

*

अनंत प्रशांत एकांत । सहज संपूर्ण आनन्द ।

शिव स्वरूप उप स्थित । साधके केवल परमार्थ ।।

*

~

साधक विश्व मित्र

अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन,

ओ भोले साधक!

परमार्थ में मन नहीं लगता,

मन संसार स्वार्थ में रमता,

जप जाप ताप सा भाता

अब क्या करे साधक?

*

ओ भोले साधक!

मन लगने से जप नहीं होता,

जप जपनेसे से मन लगता हे,

स्वरूप साधना में।

*

जीवन में साधना की नहीं जाती,

साधना में जीवन जीते हे,

जीवन ही साधना हे,

सदा सर्वदा।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , ,

अलख अमल, अल्-मस्त खजाना

सत् संग भजन – कर तू रोज़ाना

विश्व गीत – सुमधुर स्वर गाना

श्री सत् गुरु मंत्र – निरंतर जपना

हर करम – शंभु समर्पित करना

*

बिन सेवा – एक भी पल ना गवाना

तू मुफ़्त का खाना – कभी ना खाना

संसार की खटिया – कही ना सोना

जब दुनिया सोवे – तब तू जगना

*

उस शून्य गुफा – तू डटके रहना

ना कही आना – कही ना जाना

यहा तेरा – कुछ भी ना लेना देना

जो मन चाहे गाली – दे ये जमाना

*

पर साधक भोले – मस्त तू रेहेंना

*

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन, , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु-भजन मे हे

{ वो गप-शप मे नही }

जो आनंद तत्व-चिंतन मे हे

{ वो संसार-चिंता से नही }

जो आनंद सरल-त्याग मे हे

{ वो विषय-भोग मे नही }

जो आनंद असंग-एकांत मे हे

{ वो समागम-संग मे नही }

*

जो आनंद – ध्यान मे हे

जो आनंद – मौन मे हे

वो सहज – अघोर आनंद

हम से हे – हम मे हे – हम ही हे

*

वो आनंद – अपना स्वरूप हे

वो आनंद – राम मय हे

वो राम – आनन्दमय हे

वो राम ही स्व स्वरूप हे

*

जगत मे हम नही – जगत हम मे हे

हम तो – हमेशा हे – थे – रहेंगे

हमारा कुछ नही

सब कुछ राम हे

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे

रोम रोम – राम हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

साधक परिचय

एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।

{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}

बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?

साधक: जी बोलिए, महाराज।

बुढ़ाऊँ: आप का नाम?

साधक: साधक भोला राम भरोसे

बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?

साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।

बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।

साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।

बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?

साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।

साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?

बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।

साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।

{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}

बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?

साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।

बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?

साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।

साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।

बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!

साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?

बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।

साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?

बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।

साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।

शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।

बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?

*

अघोर आत्म भान, , , , ,

जागो!

लाखों सपने इरादे, ना एक हकिकत होवे,

फिर भी तू तकता जावे, फिर भी तू थकता जावे।

*

और जब एक भी इच्छा पार हुई, तब दूजी अपना राज चलावे।

ये तो मायाजाल रचा हे, इंद्रधनु मृगजाल गवाह हे,

अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।

अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।

*

तू भवर में डूबा जावे, अब कोन तुम्हें बतलावे,

और कोन किसे हे बचावे, कोन किसे हे बचावे।

*

एक ही साध्य है, एक हे साधन, एक गुरु हे, एक हे भगवन।

साधक खुद ही खुद को जगावे, साधक खुद ही खुद को जगावे।

~

साधक भोला राम भरोसे, ले खाली झोला प्यार परोसे

अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन,

युगन युगन हम योगी

सून कपालिका, मेरे खप्पर यारा,

हम माने या ना माने, जाने या ना जाने, हम तो सनातन अघोर साधक है। बस हम भूल चुके हे इस सनातन सत्य को, और यह वहाँ भटक रहे हे, स्वयं की खोज मे। दादाजी की ऐनक; कहानी तो सुनी होगी। प्यारे, अभी कुछ नही बिघड़ा, बस खुद को जगाना हे, याद दिलाना हे। सत्य भीतर दोहराना हे। निर्भय स्वर लगाना हे।अघोर भजन गुनगुनाना हे। युगन युगन हम योगी, हा योगी।अवधूता

यह नाथ भजन, अघोर साधक की आत्म-कहानी हे। ये शब्द, ये धुन अघोर साधक को, इस आनंद यात्रा में एक चैतन्य प्रदान करती अकाट्य जोश पैदा करती हे। जोश में होश बरकरार रख अघोर साधक तत्व चिंतन मगन, निरंतर स्वरूप पथ ही अपनाता हे। सत् गुरु ज्ञान प्रसाद संस्मरण, स्वयं प्रकाश मैं अघोर सत्य लखाता हे। अवधूता, युगन युगन हम योगी।

ओम,

अघोर आनंद

काम जारी हे। ना रुकावट, ना खेद।

अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन

साधक प्रेम / संबंध

प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।

भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।

जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।

धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।

॥ ओम अघोर आनंद ॥

साधक

सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।

शिव – चित् + आनंद शक्ति

चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।

शिव शिव शिव कल्याण करी ।

चित्-विलास = आरपार

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , , ,

पागल

भोग मुक्त हो जाओ

रोग मुक्त हो जाओगे

भव रोग मुक्त हो जाओ

जीवन मुक्त हो जाओगे

~

जागो साधक भोला

अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे

मौन हो जाओ, चैन में रहोगे

हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे

प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे

*

स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे

भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे

सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे 

अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे

*

पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे

पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे

पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे

पागल हो जाओ, बेवकूफ़ी से बचोगे

*

अघोर आत्म भान, ,

प्रकट गुह्य

संपूर्ण मे अपरिवर्तनीय परिवर्तन – प्रकट गुह्य

EVERY POUR OF EXISTENCE IS FILLED WITH DIVINE DIVINITY.

{ राम रसायन }

RAAMA RASAAYANA.

EVERYTHING IS { राम } RAAMA.

THROUGH AND THROUGH { आरपार }.

SOLID FLUX

{ आनन्दघन }

SOLID SPACE. दिव्य द्रव्य DIVINE DIVINITY.

अघोर आत्मभान obvious internalisation

INTERNALISATION

THE SILENCE & THE SOULITUDE

आरपार

होशियार हो तड़ीपार फ़रार

लगातार बरकरार हर बार

सरकार आधार बेकार

प्यार यार संसार बलात्कार

चमत्कार निराधार लाचार

सारासार विचार सत्कार

इसपार या उसपार, जीले आरपार

निर्विकार

नमस्कार सार साक्षात्कार

कोई आर, या कोई पार,

सच्चा समझदार आरपार

अघोर आत्म भान, ,

ॐ आदेश

अऽउऽम

रे ऽऽ आरपारी !

*

ये जीवन हलकेमे मत लेना,

बस हलके फुलके, खुलके जीना।

*

ना फुदकना, ना मुरझाना,

थोडा मान-अपमान सहना।

॰॰। यहा सुखी-दुःखी होना, हे सख्त मना। ॰॰

*

साहस करना, भूलना-भटकना,

गलती करना, पर कभी ना दोहराना, 

सदा सीखना, बासी ना होना, ताजा-ताजा रहना।

थोडा मुस्कुराना, थोडा गुनगुनाना,

खुद-खुशी बाटना, एकांत पाना।

*

बली-का-बकरा नाही बनाना

सदा मेरा-मेरा, मे-मे, ना करना,

बस ‘मे’ को पहचानना, जानना,

जाना-बनजाना।

खोजना नाही, खो-जाना।

*

कही ना अटकना, कही ना चिपकना,

कुछ भी ना करना, जो-होना वो-होना, 

ना कभी पछताना, कभी ना रोना-धोना,

खुद-खुशी मे जीना।

*

श्रद्धा जपना, आत्मविश्वास रखना,

चिंता नाही, चिंतन करना,

मन-रंजन नाही, मन-मंथन करना,

कल नाही, कल-भी नाही, आज-भी नाही,

बस अभी-ही जीना।

*

स्वस्थ रहना, व्यस्त रेहना, चुस्त रहना

अल् मस्त रहना।

*

रे ऽऽ सच्चे ! समृद्ध – संतुष्ट रहना,

जीवन अपरूप गहना, ये व्यर्थ ना गवाना

जिस काम से पधारे, वो जल्द निपटाना,

और यहा से रवाना हो जाना।

*

॰॰।काम-तमाम, रोख-इनाम।॰॰

धन्यवाद कहो – दफा हो जाओ।

राऽम राऽम

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान,
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