ॐ अघोर आदेश

ऐसा सब

अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी

वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।

ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,

अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।

*

अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।

हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।

कुछ पाना खोना नहीं।

कही आना जाना नहीं।

कोई अपना पराया नहीं।

सब एक हे।

*

स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।

दुनिया बस मन की भ्रांति हे।

मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।

अब कुछ फरक नहीं पड़ता।

~

MIND BLENDING,

MIND BENDING!

MIND ENDING.

“MIND yo!ur MIND”

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

मस्त

विश्व गीत मधुर स्वर गाना ।

सत्संग भजन तू कर रोज़ाना।।

साधन गुरु मंत्र तू हर पल जपना।

हर करम शंभु समर्पित करना।।

*

मुफ़्त का खाना कभी ना खाना।

पर साधक भोले मस्त तू रेहेंना।।

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन,

अलख अमल, अल्-मस्त खजाना

सत् संग भजन – कर तू रोज़ाना

विश्व गीत – सुमधुर स्वर गाना

श्री सत् गुरु मंत्र – निरंतर जपना

हर करम – शंभु समर्पित करना

*

बिन सेवा – एक भी पल ना गवाना

तू मुफ़्त का खाना – कभी ना खाना

संसार की खटिया – कही ना सोना

जब दुनिया सोवे – तब तू जगना

*

उस शून्य गुफा – तू डटके रहना

ना कही आना – कही ना जाना

यहा तेरा – कुछ भी ना लेना देना

जो मन चाहे गाली – दे ये जमाना

*

पर साधक भोले – मस्त तू रेहेंना

*

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन, , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु-भजन मे हे

{ वो गप-शप मे नही }

जो आनंद तत्व-चिंतन मे हे

{ वो संसार-चिंता से नही }

जो आनंद सरल-त्याग मे हे

{ वो विषय-भोग मे नही }

जो आनंद असंग-एकांत मे हे

{ वो समागम-संग मे नही }

*

जो आनंद – ध्यान मे हे

जो आनंद – मौन मे हे

वो सहज – अघोर आनंद

हम से हे – हम मे हे – हम ही हे

*

वो आनंद – अपना स्वरूप हे

वो आनंद – राम मय हे

वो राम – आनन्दमय हे

वो राम ही स्व स्वरूप हे

*

जगत मे हम नही – जगत हम मे हे

हम तो – हमेशा हे – थे – रहेंगे

हमारा कुछ नही

सब कुछ राम हे

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे

रोम रोम – राम हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

बजो!

हम एक साज़ हे, बे सुरे बज रहे हे।

अगर मन में हरी की बाँसुरी सज रही हे,

अगर दिल मे भोले का डमरू बज रहा हे,

तो हम गीत हे, जीवन संगीत हे।

ॐ अघोर आदेश, ,

उद्यमो भैरव:

उद्यमो भैरव:

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

उद्यमो भैरव:

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, , , , ,

सनातन

सदा चेतन

सनातन

संत साधन

सनातन

गुरूवचन

सनातन

सामगायन

सनातन

प्रभु भजन

सनातन

संकीर्तन

सनातन

राम शरण

सनातन

स्वरूप चिंतन

सनातन

नाम स्मरण

सनातन

अवधूत मगन

सनातन

हंस गगन

सनातन

सत्य वचन

सनातन

सत्चिदानंदनघन

सनातन

ॐ अघोर आदेश, , ,

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो सदा यह ही था।

वो भूलसे,

खुद को भूल जाता है

उसका जन्म होता है

वो नाम रूप पाता है।

जो जाना है, 

वो जीता है

जब सीखे वो हर पल

तब साधक कहलाता है।

जग जाता है, जागता है, जगाता है।

हिसाब के परे जीता हे।

जीवन संगीत गाता हे।

~

“जो जाना, वो बन जाना

अब कही ना आना जाना।”

~

“जो ज्ञान वो जीवन उतरा

वो ज्ञान से राह मिलेगी।”

~

“जब हृदय प्रभु प्रीत खिलेगी

तब प्रेम की नदी बहेगी।”

~

अरे सुन, प्रभु भजन मगन दीवाने

हम जाने तेरे बहाने।

*

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन,

अवधू अघोर आनंद

अवधूता, अवधूता

गीत गाता

प्रभु-प्रीत जगाता

सत्संग समाता

असंग जीता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

धूनी रमाता

अलख लगता

चिलम चिताता

शून्य मे रमता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

खूद को खोता

गगन समाता

ना कभी जीता

ना कभी मरता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

कुछ नहीं करता

दिख नहीं पाता

बन सबकी माता

विश्व चलाता

अवधूता

*

आदेश नाथ गुरु शिष्य सहारा

सत् गुरु वचन संजीवन गीता

अवधूता, अवधूता

~

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, , , ,

मे मरगया बाबा

आदेश

*

मे मर गया, सो तू भी मरेगा

मारनेवाला, मे से मिलेगा

शिव कैलाश, पता कहेगा

अदबुध मैयत उत्सव होगा

*

जय जय जय शंकर नारा, मे से मारा

जय जय जय शंकर न्यारा, मे को मारा

शिव-गुरु तारण हारा, एक सहारा

मे तो हो गया, भगवन प्यारा

मरगया बाबा, नीर अहंकारा

*

मे मर गया बाबा, राम नाम सत्य हे, नित्य हे।

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, , , ,

चल ना भाई

चल ना भाई तू , समझता क्यों नहीं

– जिधर किधर हे अटका, उधर से निकलता क्यों नहीं

दिल तेरा दुनियासे फिसलता क्यों नहीं

– फक़ीर साधु बोला दिमाग़ में घुसता क्यों नहीं – तेरे

गुंडा गर्दी, दुनिया दारी, तू छोड़ता क्यू नही?

– क्या सही क्या गलत फैसला, तू करता क्यों नहीं

दुनिया में इज्जत से तू रहता क्यों नहीं

– चार शब्द बाते प्यार के तू बोलता क्यों नहीं?

तू जानता कुछ नही, ये तू मानता क्यों नहीं

– इधर उधर कुछ भी नही, अपने भीतर झाको

मन क्या तेरा शांत हे? राडे-लफड़े लाखों

जाग जा साधक

मे मर गया बाबा

राम नाम सत्य हे

अमर अनंत नित्य हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन, , , , ,

ॐ भोले सबके होले

बम बम भोले

सब के होले

सब के बन कर

सब का भला कर

*

बम बम शंकर

सब के अंदर, 

खुद को चेता कर

सब का भला कर

*

जय शंभो शंकर

सत को बया कर

जय जय शंभो शंकर

सब का भला कर

*

शंभो शंकर महादेव

बम भोले नाथ

ॐ भोले

सबके होले

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, ,

सच्चा मरना अच्छा मरना

भेद मिटाना, खुदी लखाना

आनंद जताना, ख़ुद खुशी बहाना

छोटापन मरना, दिव्य जुडजाना

खुद से बढ़कर, भव्य समाना

*

मरते दम तक, मस्त दीवाना

बार बार नही, वापस आना

गुरुचरण समर्पण, अहु अहु मिटना

रे प्यारे, एक ही बारी, पर सच्चा मरना

~

सच्चा मरना, अच्छा मरना

मरगया बाबा, जुग जुग जीना

ॐ अघोर आदेश,

अघोर आनन्द मंत्र गान

आनन्दम

आनन्दम

आनन्दम

सत् चित् आनंद

*

आत्मानन्दम

ब्रह्मानन्दम

परमानन्दम

परमशिव आनन्द

*

स्वरूपानन्दम

सहजानन्दम

शून्यानन्दम

अघोर आनन्द

*

शान्ति

शान्ति

शान्ति

तत् सत्

*

समय ३।३३ सुबह ब्रह्म-मुहूर्त

११ प्रणव + अघोर आनंद मंत्र गान

तट पश्चात १०८ प्रणव जप विधि

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, ,

खुद को साधो

संन्यासी साधक हे। संसारी साधक हे। साधु साधक हे। सिद्ध साधक हे। संत साधक हे।गुरु साधक हे। शिष्य साधक हे। मुमुक्षु साधक हे। महात्मा साधक हे।

और एक बात, साधक की कोई पहचान नहीं होती। वो सब में मिला हे, पर सब के परे हे। इर्द गिर्द दिखता नहीं, पर होता हे। पागल लगता हे, पर होता नही।

आप भी साधक हो। बस साधक ही रहो। स्वानुभव से सीखो। खुद को साधो।

*

ॐ अघोर आदेश, ,

भीतर झाँको

(भीतर की ओर एक मुस्कुराती यात्रा)

हर दिन — थोड़ा और
| समझो |

हर दिन — थोड़ा कम
| उलझो |

भीतर झाँको

मूर्ख बनो — धीरे धीरे,
शांति से, आनंद में,
{ अनुग्रह में }

भीतर झाँको

खिल रहे हो,
फूल बन रहे हो,
उभर रहे हो,
बस ~ बह रहे हो —
{ सजगता में,
न कि जानने में }

भीतर झाँको

यह सब हो रहा है।
साँस चल रही हे।
अंदर और बाहर,
बिना किसी
शंका के।

खुद को बधाई दो —
{ बनने के लिए नहीं, होने के लिए }

खुद को बधाई दो —
इस अद्भुत अनुराग के लिए,
भीतरी अनुसंधान के लिए।

भीतर झाँको

तुमने खोजा हर जगह,
हर जगह खोजा —
उसे, जो तुम्हारा ही था।
और फिर पाया —
वो खोया हुआ ख़ज़ाना,
बस
भीतर झाँककर।

~

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन, ,

सत्संग सहज़ानंद

।। ॐ आनन्दम ॐ सत्चिदानंद ॐ तत् सत् ।।

साधक ~ विश्व रूप दर्शन ~ ईश्वर दर्शन ~ स्वरूप दर्शन  

*

।। ॐ अघोर आदेश ।।

स्वांत: सुखाय ~ आनंद सत्संग

नाम:स्मरण – आत्मचिंतन – भजन – कीर्तन – स्तोत्रांजली – साधु संत गुरु वचन श्रवण – साधना सत्र

*

।। राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज की जय ।।

।। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।

ॐ अघोर आदेश, ,

ॐ आदेश

अऽउऽम

रे ऽऽ आरपारी !

*

ये जीवन हलकेमे मत लेना,

बस हलके फुलके, खुलके जीना।

*

ना फुदकना, ना मुरझाना,

थोडा मान-अपमान सहना।

॰॰। यहा सुखी-दुःखी होना, हे सख्त मना। ॰॰

*

साहस करना, भूलना-भटकना,

गलती करना, पर कभी ना दोहराना, 

सदा सीखना, बासी ना होना, ताजा-ताजा रहना।

थोडा मुस्कुराना, थोडा गुनगुनाना,

खुद-खुशी बाटना, एकांत पाना।

*

बली-का-बकरा नाही बनाना

सदा मेरा-मेरा, मे-मे, ना करना,

बस ‘मे’ को पहचानना, जानना,

जाना-बनजाना।

खोजना नाही, खो-जाना।

*

कही ना अटकना, कही ना चिपकना,

कुछ भी ना करना, जो-होना वो-होना, 

ना कभी पछताना, कभी ना रोना-धोना,

खुद-खुशी मे जीना।

*

श्रद्धा जपना, आत्मविश्वास रखना,

चिंता नाही, चिंतन करना,

मन-रंजन नाही, मन-मंथन करना,

कल नाही, कल-भी नाही, आज-भी नाही,

बस अभी-ही जीना।

*

स्वस्थ रहना, व्यस्त रेहना, चुस्त रहना

अल् मस्त रहना।

*

रे ऽऽ सच्चे ! समृद्ध – संतुष्ट रहना,

जीवन अपरूप गहना, ये व्यर्थ ना गवाना

जिस काम से पधारे, वो जल्द निपटाना,

और यहा से रवाना हो जाना।

*

॰॰।काम-तमाम, रोख-इनाम।॰॰

धन्यवाद कहो – दफा हो जाओ।

राऽम राऽम

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान,

ॐ अघोर आनंद परिचय

कौन हे आप?

रे ऽऽ आरपारी ! एक ही पहचान हमारी, हम भोले के चेले, स्वतंत्र स्वच्छंद अकेले।

रे ऽऽ सच्चे ! स्वयं के बारेमे, स्वयं ही बतलाना, बिलकुल जरूरी नही।

दुनिया तो सवाल करेगी, तो जवाब देना जरुरी नही। पर भीतर जवाब पता होना, जरुरी हे।

सवाल कुछ नये नही, बस वही-वही, वही-वही। इन लाजवाब सवालो का कोई जवाब नही।

क्या? क्यों? कौन? कैसे? कब? कहा? ऐसे सवाल, सब बवाल। तू ना इन्हे चारा डाल, तू खुद को संभाल।

इनसे बचो। पर इन खातिर एक-बारी, स्वयं से स्वयं ही पूछ लेना। आज का सच, सच बताना। प्रश्न से मुक्त हो जाना।

रे ऽऽ सुन ! कुछ सवाल जो ‘कभी किसी से ना पूछने चाहिये’। कुछ वही सवाल जो ‘सबसे जादा पूछे जाते हे’। और उनके सच्चे जवाब – जो कभी ना देना, ये सवाल ही अटकाते-भटकाते हे।

आपका नाम क्या हे?

नाम नाम-मात्र हे, राम-नाम महा-मंत्र हे।

जो आपको जैसे पुकारे वही आपका नाम।

वो जो पुकारे भाता हे, सच्चे ! प्यार का नाता हे। जो पूरा-पूरा जीता हे, आरपार कहलाता हे।

माँ-बाप ने रखा नाम?

माता-पिता ने देह को जन्म दिया, देह को नाम दिया। वो जादा ना टीका, धुल गया। मरने से पहिले ही, पुनर्जन्म साकारा, गुरुतत्व अस्तित्व पुकारा, “ ऽऽ आरपार ऽऽ ॐ अघोरआनंद”।

असली नाम?

नकली वस्तु का असली नाम नही होता।

आप कहासे हे?

यहा से। अभी जहा हे, वहा से।

कहाके रहने वाले? पता?

अभी जहा हे, वहा! याने यहा।

आपका माँ बाप? परिवार?

सारा जगत परिवार हमारा, सनातन सत् सहारा। बाप-भोले, माँ-तारा, शिव-लोक संसार हमारा।

हम सब भूल गये।अब सब रिश्ते-नाते बस सुहृद मित्र समान लगते हे। अब कोई विशेष संबंध नही।पर सत् संबंध हे।

पर यहा कैसे?

ऐसेही भ्रमण करते, यहा पधारे। जैसे हे वैसे। ऐसे।आप का जन्म कहा, कब, क्यू हुआ? इस सवाल का जवाब नही।

आप पढे-लिखे हो? कितने पढे हे?

हम कुछ जादा ही पढे लिखे हे। इसलिए बेकार हे। हमारे लायक नौकरी-व्यवसाय अब तक पैदा ना हुए। इसलिए बेकार हे। हमारी पुश्तोंकी जायदाद हे, इसलिए कुछ नही करते। { ऐसे मत बताओ }। बताओ जितना जरुरी हे पढ़ लिये। पढ़-लिख पाते हे, हिसाब कर पाते हे। प्रभु की कृपा हे।

आप क्या काम करते हे?

हर काम करे बदनाम, भोला निरंतर निष्काम, श्रीसंतगुरुवचन अंतिम आराम, आदेश राम नाम।

{ ऐसे मत कहना }। कहना कुछ छोटा-मोटा काम कर लेते हे। बचे समय प्रभु भजन होता हे।

आप कुछ तो रोजाना काम करते होगे !?

हाँ। कुछ नही-करते, नही-करते, नही-करने मे ही, कितना कुछ हो जाता हे। जीस परिस्थिति, जिस पल, जो जरुरी हे, वो हम से होता हे। पूरी लगन से, हक से, शौक से, काम जारी हे, हम व्यस्त हे। मस्त हे। तंदुरुस्त हे, चुस्त हे। भोले जबरदस्त हे।रे ऽऽ सच्चे ! हम जिस लायक हे, वही हमसे होता हे।

आप की कमाई? खर्चा पानी? गुजारा? कैसे होता हे?

आपकी सहायता से। जिसने पैदा किया, जिसने अबतक पाला, उसकी कृपा से। वैसे अब कुछ और जरूरत नही। सत् काम जारी हे। जो हे, वो सब कुछ हे। अब जितना हे, पर्याप्त हे। अच्छे से गुजारा हो रहा हे। दुनिया पे बोझ नही हमारा, ना दुनिया हम पे बोझा हे।

आपका धर्म? और जाती?

सनातन मनुष्य धर्म, जाती और जीवन।

क्या आप अध्यात्म मे हे?

आपके गुरु कौन हे? कहा हे? क्या वो जिंदा हे? क्या उनसे बात हो सकती हे? क्या उन्हे मिल सकते हे?क्या आप उन्हे अक्सर मिलते हे?

ॐ सच्चे! स्वच्छंद नाथ गुरु-तत्व हे। गुरु-नाम, किसी देह का नाम नही। गुरु कोई देह नही, वो साक्षात् तत्व हे। अपने हर अनुभव से सीखने की, और सीखी जीवन मे उतारने की, जो असीम शक्ति हे, वह गुरु अनुग्रह हे। गुरु-बिन ये नामुमकिन हे।

शिष्य के हृदय, गुरु प्रकट होते हे। गुरु कुछ सिखाते नही, शिष्य गुरुसे सिखता हे। शिष्य का महत्व हे। अगर शिष्य सक्षम हो, तो जगत मे ऐसी कोई ताकत नही, जो आपको स्वयं परिचय से रोक पाए। गुरु वचन सत्य वचन।

रे ऽऽ सच्चे ! शिष्य गुरु से चिपकते नही, और गुरु चिपकने देते नही। हम कच्चे गुरु के चेले नही, जो की सत् गुरु कच्चा होता ही नही, वो तो पक्का पका, ताजा ज्ञानामृत हे। गुरु-शिष्य एक ही चैतन्य हे। वही एक, गुरुपद धारण किए अनुग्रह कारक हे, और वही शिष्यबन गुरुआदेश श्रवण ग्राहक हे। सब एक ही हे, मानो दो में बटा नजर आता हे। गुरु-शिष्य ये रिश्ता नही, यह निष्काम प्रेम का नाता हे, जो एक दूसरेको जखड़ता नही, उलझाता नही बलकि असंगता, स्वतंत्रता से सहज सुलझाता हे।

गुरु सेवा? गुरु दक्षिणा?

सच्चे! गुरुवचन-सत् वचन मानकर, फिर जानकर, फिर परिधानकर, सहज-सावधान, सदा-चेतन, जीवन अनुभव, जो स्वानन्द की अभिव्यक्ति हो। ऐसा स्वात्मभान ही सत् सेवा हे। सच्चे! सत् गुरु कोई सेवा-दक्षिणा लेते नही। सत् शिष्य सेवा जताते नही।

रे सच्चे! सदा साधक रहो, कभी किसके गुरु मत बनो, मार्ग-दर्शक भी ना बनो। बस मित्र भाव से रहो, समत्व भाव से रहो।

इस गुरु-शिष्य झमेले मे उलझो मत। कही किसी गुरु या आश्रम से बन्धो मत। आजीवन साधक हो, साधक ही रहो। असंग रहो, स्वतंत्र रहो। बलकि इस बारेमे, बात भी मत करो, और मत सोचो।

कुछ कल बीते बुरे कर्मो का बोझा?

नही। जो कुछ अच्छा बुरा अज्ञानी से हुआ, सब धूनी भस्म हो गया। साथ साथ अज्ञानी कर्ता भी भस्म हो गया। पर सीख भस्म ना हो पाई, सदा चेतन हे। जो अच्छा बुरा काम हुआ, सो हुआ। पर अपने गलती से सीखा, और वो गलती वापस ना दोहराई। अब ना कोई बोझा, ना ही कोई गधा।

कुछ आनेवाले कल की चिंता?

नही। कोई चिंता नही। जैसे चीताह मुर्दा जलाती, वैसे चिंता जिंदा जलाती। इस पल मे पूरा-पूरा जी लेते हे। ऐसे पल पल जो खिलता हे, गाता हे, झूमता हे। जो स्वस्थ हे, व्यस्त हे, चुस्त हे, मस्त हे, जबरदस्त हे, वो जीवन हे। हम जीव नही, हम जीवन हे। सत् निरंतर निरंजन हे।

शिवलोक! कहा?

जहा अपरिवर्तनीय-परिवर्तन। वैराग्य-ऐश्वर्य उन्मिलन। ज्ञान-भक्ति सम्मेलन। साक्षात शिव-शक्ति आंदोलन।

एक जो मानो दो मे बटा। पर बटा नही, एक ही समाया। स्वच्छंद स्वतंत्र असंग अलमस्त।

अलख निरंजन

ॐ अघोर आदेश, , ,

सुस्वागतम्

अऽउऽम

रे ऽऽ सच्चे ! सही जगह पधारे।

ऽऽ आरपार ऽऽ एक जबर सत् घुमाव ऽऽ एक दिन मे नही सही, एक दिन प्रभु कृपा से हो जाता हे।

ये साधक जीवन एक अखंड परिक्रमा हे, अघोर-आनंद यात्रा हे। बस इस रास्ते चलते चलो। इस राह पे डटके चलना, ही अंतिम मुकाम हे।

ये सबके बस की बात नही। हम उसे नही, वो राह हमे चुनती हे।

सब लिखा हे, अगर ऽ कोई ऽ पढ़ लिया।

वो रस्ता दिखाया, अगर ऽ कोई ऽ चल दिया।

जो जान पाया, जान पाया। जो डूब गया, सो बचगया ।॰

जो मिला खुद-से, खुद-को, जैसे के तैसे ऽऽ आरपार ऽऽ, वह अघोर-आनंद समाया।

बाकी सब अपने-अपने जगह ठीक हे, पर उन-उस सब में वो बात नही, वो बस ऊपरी-ऊपर हे, पर अपार-अपरमपार, ऽऽ आरपार ऽऽ नही।

रे ऽऽ सच्चे ! सदा सावधान, इक-पल ना छूटे आत्मभान।

॰॰। कच्चा मोह-संसार, सच्चा ऽऽ आरपार ऽऽ ।॰॰

जय हो ! सच्चे की।॰

“इस यात्रा मे आपका सदा स्वागत हे।”

ॐ अघोर आदेश, ,

ॐ आरपार आदेश

एक जबरदस्त घुमाव

साधक नित्य-नूतन जीता हे, ये यात्रा अखंड हे।

साधक स्वयं एक अनुभव-शृंखला से गुजरता हे, हर अनुभव कुछ सीखता हे। जो जाना, बन जाता हे। ये सत्संग-चर्या, साधक स्वयं की जरूरत, मोहब्बत हे। हसते-गाते वक्त अच्छा गुजरता हे। सब अघोर आनंद भजन साधन हे।

ये साधन-चर्या स्वयं अनुस्मारक हे। ये ‘सत्संग-साधन-शृंखला‘, पूज्य सत्गुरु प्रसाद हे।

तथा साधु-संत-परम-परा-वाणी, सत्-गुरु सत्-वचन की गूंज हे। जो हृदय से आरपार होके, अस्तित्व से टकराती हे। सब मोह मिटाती हे, खुद को-खुद से मिलाती हे। अब अस्तित्व का अलग से कोई नामो निशान नही। सब आरपार

साधक जब सत्-गुरु अनुग्रह अपार-कृपा-प्रसाद पाता हे, गुरु-मंडल गुरु-तत्व जुड जाता हे, सब धन्य-धन्य हो जाता हे। स्वयं में एक अपूर्व अमुलाग्र बदलाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

जीवन मे एक ज़बरदस्त घुमाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

॥ स्वान्तः सुखाय। ओम नमः शिवाय ॥

ॐ अघोर आनंद

आरपार आदेश

~

ॐ अघोर आदेश,
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