आरपार

ऐसा सब

अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी

वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।

ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,

अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।

*

अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।

हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।

कुछ पाना खोना नहीं।

कही आना जाना नहीं।

कोई अपना पराया नहीं।

सब एक हे।

*

स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।

दुनिया बस मन की भ्रांति हे।

मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।

अब कुछ फरक नहीं पड़ता।

~

MIND BLENDING,

MIND BENDING!

MIND ENDING.

“MIND yo!ur MIND”

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

ओ भोले साधक!

परमार्थ में मन नहीं लगता,

मन संसार स्वार्थ में रमता,

जप जाप ताप सा भाता

अब क्या करे साधक?

*

ओ भोले साधक!

मन लगने से जप नहीं होता,

जप जपनेसे से मन लगता हे,

स्वरूप साधना में।

*

जीवन में साधना की नहीं जाती,

साधना में जीवन जीते हे,

जीवन ही साधना हे,

सदा सर्वदा।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु-भजन मे हे

{ वो गप-शप मे नही }

जो आनंद तत्व-चिंतन मे हे

{ वो संसार-चिंता से नही }

जो आनंद सरल-त्याग मे हे

{ वो विषय-भोग मे नही }

जो आनंद असंग-एकांत मे हे

{ वो समागम-संग मे नही }

*

जो आनंद – ध्यान मे हे

जो आनंद – मौन मे हे

वो सहज – अघोर आनंद

हम से हे – हम मे हे – हम ही हे

*

वो आनंद – अपना स्वरूप हे

वो आनंद – राम मय हे

वो राम – आनन्दमय हे

वो राम ही स्व स्वरूप हे

*

जगत मे हम नही – जगत हम मे हे

हम तो – हमेशा हे – थे – रहेंगे

हमारा कुछ नही

सब कुछ राम हे

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे

रोम रोम – राम हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

बातचीत

सब कैसा हे? जैसा हे, वैसा हे, बढ़िया हे।

क्या हे? सब कुछ, कुछ नहीं

कब हे? बस अभी, कल नहीं ना कल हे।

क्यों हे? ऐसे ही।

किधर हे? आप जिधर हो

दुनिया से कुछ वास्ता? पता नहीं, दुनिया क्या हे।

शादी हुई? पिछले जनम।

कभी प्यार हुआ? जबसे हे, प्यार में हे।

किसके? आप के।

क्या मज़ाक़? दुनिया मज़ाक़।

करते क्या हो? बेकार हूँ।

खर्चा पानी ? बस आप की कृपा हे।

समय कैसे बीतता हे? बस गुनगुनाते रहते हे।

सच क्या हे? सब कुछ नहीं।

आनंद में हो? आनंद हम में हे, हम से हे।

ये आनंद मुफ़्त में हे? ये बिकता नहीं, मुफ़्त भी नहीं।

कुछ अच्छी बुरी आदतें? जो भी आप से लग गई, लग गई।

कुछ करना बाक़ी हे? जी नहीं, जिस काम से आए थे, हो गया

क्या काम? कुछ नहीं।

क्या करोगे? सब हो तो रहा हे, करना क्या हे!

पागल हो? जी बिलकुल।

योगी कौन हे? योगी रोगी ही हे।

रोगी कौन हे? जो भोगी हे।

आप कौन हो? महारोगी।

क्या बीमारी? राम नाम की महामारी।

कोई आख़री ख़्वाहिश? आख़री ऐसा कुछ होता नहीं, जनाब!

मरने का डर? मरना नामुमकिन हे।

समझ? बंधन।

भगवान? साक्षात आप हो

चेतना? आप से ही हे।

कर्म? प्रभु चिंतन।

असफलता? प्रभु इच्छा।

सफलता? प्रभु कृपा।

कुछ कहना बाक़ी हे? और कुछ पूछना बाक़ी हो, तो कहे।

~

संसारी परेशान बन चल निकला, साधक भोला चाय बीड़ी कर निकला।

अघोर आत्म मंथन, , , ,

साधक परिचय

एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।

{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}

बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?

साधक: जी बोलिए, महाराज।

बुढ़ाऊँ: आप का नाम?

साधक: साधक भोला राम भरोसे

बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?

साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।

बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।

साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।

बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?

साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।

साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?

बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।

साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।

{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}

बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?

साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।

बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?

साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।

साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।

बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!

साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?

बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।

साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?

बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।

साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।

शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।

बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?

*

अघोर आत्म भान, , , , ,

साधना क्या हे?

हम ये करते हे, वो करते हे, बड़ी साधना करते हे, कहते हे।

असल में ये उँट पटंग, साधना हे?

आख़िर साधना हे क्या?

और साधना से क्या साधना हे?

एक ही साधन हे। बाक़ी सब तमाशा।

अपने अंत:करण की स्थिति को पहचान साधक।

मन तो आइना हे, जगत संसार की प्रतिमा मन में नैसर्गिक हे। जीव- जगत – वस्तु, वातावरण के अनुसार मन में संकल्प-विकल्प आते रहेंगे। अच्छे-बुरे विचार आते-जाते रहेंगे। ये द्वैत की बू स्वाभाविक हे। बाहिर जो हो रहा हे वो होने दो, जैसा हो रहा हे होने दो, अपने भीतर झाँको साधक।

बस इतनाहि करो, ध्यान दो की ये मन इन विचारो से प्रभावित ना हो, विक्षेपित ना हो। इस जगत में अंदर बाहिर कुछ भी हो जावे, साधक का मन कभी विक्षेपित ना हो। कभी किसी बात से मन विक्षेपित हुआ ही, तो उस अनुभव से सीखो। आत्म चिंतन करो। धीरे धीरे मन शांत हो जाएगा।

फिर भी सिख ना पाओ, तो उपासना जैसे सत्संग, भजन, नाम:स्मरण, संत सेवा में मन को लगाओ। उपासना से मन:शुद्धि हो जाती हे। संसारी मन ही साधक मन हो जात हे।

चाहे कैसे भी विचार हो, इन विचारो की शृंखला को ही विक्षिप्त मन कहते हे। अत: राम नाम को अपनी साँस से बांधो। नाम ही इस शृंखला का प्रतिबंध हे। भजन मगन रहो।

स्व स्वरूप में बिलकुल स्थित रहेना हे।

अपने मन की शान्ति कभी, किसी कारण छूटे नाहीं, ये सावधानी ही असल में साधना कहलाती हे।

ये साधना अखंड चलती रहे। इस में बाधा ना आवे।

सदा चेतन रहो, प्रसन्न रहो, सदा आनंद में रहो।

आनंद को पाना नहीं हे। वो तो भोग कहलाता हे। आता जाता हे।

आनंद में रहना हे। आत्म आनंद, बस अपने होने का आनंद।

स्व स्वरूप सत् चिदानंद ही हे।

ध्यान करो नहीं, ध्यान दो।

बस इस बात पे ध्यान दो।

सावधान हो जा साधक।

बाहर कुछ नहीं, सब मन का खेल हे।

बाक़ी कुछ करो ना करो, कुछ फ़रक नहीं पड़ता।

बस भीतर ध्यान दो।

काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह ही मन के विक्षेप हे।

देखो कही किसी व्यक्ति वस्तु विशेष से मन आसक्त तो नहीं?

ये आसक्ति जा-सकती हे।

गुरु वचन सत्य वचन।

शांत, प्रसन्न साधक मन ही, एक में विलीन हो जाता हे।

परमात्म दर्शन अपने भीतर ही हो सकता हे, स्व स्वरूप।

प्रभु कृपा, गुरु कृपा, और अघोर आत्म कृपा से, साधक हृदय में ही परमात्मा प्रकट होता हे।

साधना से कुछ साधना नहीं।

नया कुछ नहीं मिलेगा, जो आपका ही था, हे, रहेगा – वो आपको पुन: प्राप्त होगा।

जाग जा साधक प्यारे।

~

साधक विश्व वाणी

Blog अघोर आत्म मंथन, , ,

सनातन

सदा चेतन

सनातन

संत साधन

सनातन

गुरूवचन

सनातन

सामगायन

सनातन

प्रभु भजन

सनातन

संकीर्तन

सनातन

राम शरण

सनातन

स्वरूप चिंतन

सनातन

नाम स्मरण

सनातन

अवधूत मगन

सनातन

हंस गगन

सनातन

सत्य वचन

सनातन

सत्चिदानंदनघन

सनातन

ॐ अघोर आदेश, , ,

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो सदा यह ही था।

वो भूलसे,

खुद को भूल जाता है

उसका जन्म होता है

वो नाम रूप पाता है।

जो जाना है, 

वो जीता है

जब सीखे वो हर पल

तब साधक कहलाता है।

जग जाता है, जागता है, जगाता है।

हिसाब के परे जीता हे।

जीवन संगीत गाता हे।

~

“जो जाना, वो बन जाना

अब कही ना आना जाना।”

~

“जो ज्ञान वो जीवन उतरा

वो ज्ञान से राह मिलेगी।”

~

“जब हृदय प्रभु प्रीत खिलेगी

तब प्रेम की नदी बहेगी।”

~

अरे सुन, प्रभु भजन मगन दीवाने

हम जाने तेरे बहाने।

*

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन,

चल ना भाई

चल ना भाई तू , समझता क्यों नहीं

– जिधर किधर हे अटका, उधर से निकलता क्यों नहीं

दिल तेरा दुनियासे फिसलता क्यों नहीं

– फक़ीर साधु बोला दिमाग़ में घुसता क्यों नहीं – तेरे

गुंडा गर्दी, दुनिया दारी, तू छोड़ता क्यू नही?

– क्या सही क्या गलत फैसला, तू करता क्यों नहीं

दुनिया में इज्जत से तू रहता क्यों नहीं

– चार शब्द बाते प्यार के तू बोलता क्यों नहीं?

तू जानता कुछ नही, ये तू मानता क्यों नहीं

– इधर उधर कुछ भी नही, अपने भीतर झाको

मन क्या तेरा शांत हे? राडे-लफड़े लाखों

जाग जा साधक

मे मर गया बाबा

राम नाम सत्य हे

अमर अनंत नित्य हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन, , , , ,

साधक प्रेम / संबंध

प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।

भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।

जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।

धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।

॥ ओम अघोर आनंद ॥

साधक

सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।

शिव – चित् + आनंद शक्ति

चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।

शिव शिव शिव कल्याण करी ।

चित्-विलास = आरपार

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , , ,

मे कोन हु?

“मे कोन हु?”

जब समझो, अगर ये सवाल मेरे मन; मुझे आता ही नही, तो ‘मे’ जैसे ‘जानवर’ हू या पशु-तुल्य हू।देह तो इंसान का हे। लेकिन सिर्फ { खाना – पीना + सोना + घर-बसाना + बच्चे पैदा करना } इतनाही। ऐसे जिंदगी गुजारते गुजारते, एक दिन ‘मे’ गुजर जाना, चल बसना। माने अभी तक कहानी शुरू ही नही हुई हमारी।

“भाई! मे हु कोन? कोन हु मे?” जब ये सवाल मे खुद से करता हु, कर पाता हु; तो मे ‘इंसान’ हू, ‘मनुष्य-प्राणी’ हू। खैर अपने इंसान होने का ये एक सिद्ध-लक्षण तो हे। अच्छा! खुद का अभिनंदन किजीए। कम से कम, जो हू समझता हु, कहलाता हू, वो तो हू। हम एक जिंदा-इंसान हे ।

आगे जाके,

अगर इस सवाल को मे अक्सर टालता हु, या इसको अनदेखा-अनजाना करता हु; तो मे ‘दुनिया मे फसा’ हू। याने संसार मे भटक रहा हू। सुखी-दुखी हो रहा हूँ। मेरा कुछ नही हो सकता। मेरे लक्षण कुछ ठीक नही। मे बहिर्मुखी इन्सान हू।

अगर इस सवाल को मे सिर्फ़ पालता हू। सवाल अंदर लेके, जवाब बाहिर ढूँढ रहा हू। मतलब मुझसे जो भी दुनिया-दारी हो रही हो, वो क़ायम हे, मगर ये सवाल मेरे मन के दरवाजे पर खड़ा हे। में कभी तो कुछ करु! राह देख रहा हे। पर मे संसारी हू।जब होगा तब होगा। देखा जाएगा।

अगर इस सवाल को मे मिटाना चाहता हू, तो साधक हू। इस सवाल को मिटाना, याने मे को जानना, मे को पाना, खुद से मिलना मेरे जीवन का साध्य बन जाता हे, अगर में क्वचित आत्म जिज्ञासा रखता हु; सत्संग रमता हु; भीतर खोज रहा हु; तो मे ‘साधक’ हू। अब आर या पार।

‘स्वयं को जानना’ अगर सिर्फ़ यही एक जीवन प्रयोजन, मेरा एकमेव लक्ष्य, संपूर्ण समर्पण, मतलब अब दुनिया से कोई मतलब नही, जो होगा वो होगा, देखा जाएगा। जब मेरी अघोर साधना जारी हे, इस स्थिति मे ‘अघोर साधक’ हू। याने नित्य स्वाध्याय-उपासना-सेवा-भजन।

अगर मे आगम-शास्त्र-आदेश, सत्-गुरु-वचन, साधु-संत-वाणी को आत्मसात करने की क्षमता, इच्छा रखता हु, और कर रहा हु, हम से हो रहा हे। अपने हर एक अनुभूति से सीख रहा हु; तो में अघोर शिष्य हू।

अगर वाकई मे ‘मे’ से एकत्व, पूर्णत्व, सत् चित् आनंद स्वरूप लख जाए, तो ‘मे’ केवल परम तत्व स्पंदन हू। साक्षात परब्रह्म प्रकटीकरण ‘मे’ द्वारा हो रहा हे।

अगर सत् गुरु कृपा से, ‘मे’ स्वरूप स्थित हे , तो मे अघोर आनंद हू। जिस काम से आये थे, वो निपट गया। नैया पार। आरपार – ‘एक जबरदस्त घुमाव’। सब धन्य धन्य हे।

*

या तो मे पशु-जानवर हे, इंसान हे, जिंदा इंसान हे, संसारी हे, साधक हे, या अघोर साधक, अघोर शिष्य, अघोर आनंद हे। बस यहा तक मे की मजाल हे।

इस पश्चात असंग-अघोर-साधना।

अगर मे अंतर्मुख

बाहिर घोर हे, अंदर अघोर हे। संग घोर हे, असंग अघोर हे।

अगर ये सवाल मिट गया हे, तो संत हू।

अगर ये सवाल पूछा, तो शिष्य हू।

अगर जवाब लखाया, तो गुरु हू।

अगर बाहर ढूँढा, तो घोर हू।

अगर भीतर टटोला, तो अघोर हू।

अगर में इच्छा आकांक्षा कर रहा हू, तो में अपूर्ण हू।

अगर मे मनो कामना का पीछा कर रहा हू, तो में संसारी ।

अगर मे भोग भुगत रहा हू, तो मे

अगर में सुखी-दुखी हो रहा हू तो मे

अघोर आत्म मंथन, ,

सच्चा मरना अच्छा मरना

भेद मिटाना, खुदी लखाना

आनंद जताना, ख़ुद खुशी बहाना

छोटापन मरना, दिव्य जुडजाना

खुद से बढ़कर, भव्य समाना

*

मरते दम तक, मस्त दीवाना

बार बार नही, वापस आना

गुरुचरण समर्पण, अहु अहु मिटना

रे प्यारे, एक ही बारी, पर सच्चा मरना

~

सच्चा मरना, अच्छा मरना

मरगया बाबा, जुग जुग जीना

ॐ अघोर आदेश,

पागल

भोग मुक्त हो जाओ

रोग मुक्त हो जाओगे

भव रोग मुक्त हो जाओ

जीवन मुक्त हो जाओगे

~

जागो साधक भोला

अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे

मौन हो जाओ, चैन में रहोगे

हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे

प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे

*

स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे

भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे

सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे 

अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे

*

पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे

पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे

पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे

पागल हो जाओ, बेवकूफ़ी से बचोगे

*

अघोर आत्म भान, ,

रोम रोम ऽ राम राम ऽ आर पार

राऽम राऽम, रोम ऽ रोम, राऽम नाऽम रे।

श्री राम नाम, रोऽम रोऽम, राऽम राऽम रे॰

राऽम राऽम, पूर्ण साऽर, आऽर पाऽर रे।

श्री राम नाम, रोऽम रोऽम, आऽर पाऽर रे॰

अघोर आनंद भजन, , ,

प्रकट गुह्य

संपूर्ण मे अपरिवर्तनीय परिवर्तन – प्रकट गुह्य

EVERY POUR OF EXISTENCE IS FILLED WITH DIVINE DIVINITY.

{ राम रसायन }

RAAMA RASAAYANA.

EVERYTHING IS { राम } RAAMA.

THROUGH AND THROUGH { आरपार }.

SOLID FLUX

{ आनन्दघन }

SOLID SPACE. दिव्य द्रव्य DIVINE DIVINITY.

अघोर आत्मभान obvious internalisation

INTERNALISATION

THE SILENCE & THE SOULITUDE

आरपार

होशियार हो तड़ीपार फ़रार

लगातार बरकरार हर बार

सरकार आधार बेकार

प्यार यार संसार बलात्कार

चमत्कार निराधार लाचार

सारासार विचार सत्कार

इसपार या उसपार, जीले आरपार

निर्विकार

नमस्कार सार साक्षात्कार

कोई आर, या कोई पार,

सच्चा समझदार आरपार

अघोर आत्म भान, ,

भीतर झाँको

(भीतर की ओर एक मुस्कुराती यात्रा)

हर दिन — थोड़ा और
| समझो |

हर दिन — थोड़ा कम
| उलझो |

भीतर झाँको

मूर्ख बनो — धीरे धीरे,
शांति से, आनंद में,
{ अनुग्रह में }

भीतर झाँको

खिल रहे हो,
फूल बन रहे हो,
उभर रहे हो,
बस ~ बह रहे हो —
{ सजगता में,
न कि जानने में }

भीतर झाँको

यह सब हो रहा है।
साँस चल रही हे।
अंदर और बाहर,
बिना किसी
शंका के।

खुद को बधाई दो —
{ बनने के लिए नहीं, होने के लिए }

खुद को बधाई दो —
इस अद्भुत अनुराग के लिए,
भीतरी अनुसंधान के लिए।

भीतर झाँको

तुमने खोजा हर जगह,
हर जगह खोजा —
उसे, जो तुम्हारा ही था।
और फिर पाया —
वो खोया हुआ ख़ज़ाना,
बस
भीतर झाँककर।

~

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन, ,

ॐ आदेश

अऽउऽम

रे ऽऽ आरपारी !

*

ये जीवन हलकेमे मत लेना,

बस हलके फुलके, खुलके जीना।

*

ना फुदकना, ना मुरझाना,

थोडा मान-अपमान सहना।

॰॰। यहा सुखी-दुःखी होना, हे सख्त मना। ॰॰

*

साहस करना, भूलना-भटकना,

गलती करना, पर कभी ना दोहराना, 

सदा सीखना, बासी ना होना, ताजा-ताजा रहना।

थोडा मुस्कुराना, थोडा गुनगुनाना,

खुद-खुशी बाटना, एकांत पाना।

*

बली-का-बकरा नाही बनाना

सदा मेरा-मेरा, मे-मे, ना करना,

बस ‘मे’ को पहचानना, जानना,

जाना-बनजाना।

खोजना नाही, खो-जाना।

*

कही ना अटकना, कही ना चिपकना,

कुछ भी ना करना, जो-होना वो-होना, 

ना कभी पछताना, कभी ना रोना-धोना,

खुद-खुशी मे जीना।

*

श्रद्धा जपना, आत्मविश्वास रखना,

चिंता नाही, चिंतन करना,

मन-रंजन नाही, मन-मंथन करना,

कल नाही, कल-भी नाही, आज-भी नाही,

बस अभी-ही जीना।

*

स्वस्थ रहना, व्यस्त रेहना, चुस्त रहना

अल् मस्त रहना।

*

रे ऽऽ सच्चे ! समृद्ध – संतुष्ट रहना,

जीवन अपरूप गहना, ये व्यर्थ ना गवाना

जिस काम से पधारे, वो जल्द निपटाना,

और यहा से रवाना हो जाना।

*

॰॰।काम-तमाम, रोख-इनाम।॰॰

धन्यवाद कहो – दफा हो जाओ।

राऽम राऽम

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान,

ॐ अघोर आनंद परिचय

कौन हे आप?

रे ऽऽ आरपारी ! एक ही पहचान हमारी, हम भोले के चेले, स्वतंत्र स्वच्छंद अकेले।

रे ऽऽ सच्चे ! स्वयं के बारेमे, स्वयं ही बतलाना, बिलकुल जरूरी नही।

दुनिया तो सवाल करेगी, तो जवाब देना जरुरी नही। पर भीतर जवाब पता होना, जरुरी हे।

सवाल कुछ नये नही, बस वही-वही, वही-वही। इन लाजवाब सवालो का कोई जवाब नही।

क्या? क्यों? कौन? कैसे? कब? कहा? ऐसे सवाल, सब बवाल। तू ना इन्हे चारा डाल, तू खुद को संभाल।

इनसे बचो। पर इन खातिर एक-बारी, स्वयं से स्वयं ही पूछ लेना। आज का सच, सच बताना। प्रश्न से मुक्त हो जाना।

रे ऽऽ सुन ! कुछ सवाल जो ‘कभी किसी से ना पूछने चाहिये’। कुछ वही सवाल जो ‘सबसे जादा पूछे जाते हे’। और उनके सच्चे जवाब – जो कभी ना देना, ये सवाल ही अटकाते-भटकाते हे।

आपका नाम क्या हे?

नाम नाम-मात्र हे, राम-नाम महा-मंत्र हे।

जो आपको जैसे पुकारे वही आपका नाम।

वो जो पुकारे भाता हे, सच्चे ! प्यार का नाता हे। जो पूरा-पूरा जीता हे, आरपार कहलाता हे।

माँ-बाप ने रखा नाम?

माता-पिता ने देह को जन्म दिया, देह को नाम दिया। वो जादा ना टीका, धुल गया। मरने से पहिले ही, पुनर्जन्म साकारा, गुरुतत्व अस्तित्व पुकारा, “ ऽऽ आरपार ऽऽ ॐ अघोरआनंद”।

असली नाम?

नकली वस्तु का असली नाम नही होता।

आप कहासे हे?

यहा से। अभी जहा हे, वहा से।

कहाके रहने वाले? पता?

अभी जहा हे, वहा! याने यहा।

आपका माँ बाप? परिवार?

सारा जगत परिवार हमारा, सनातन सत् सहारा। बाप-भोले, माँ-तारा, शिव-लोक संसार हमारा।

हम सब भूल गये।अब सब रिश्ते-नाते बस सुहृद मित्र समान लगते हे। अब कोई विशेष संबंध नही।पर सत् संबंध हे।

पर यहा कैसे?

ऐसेही भ्रमण करते, यहा पधारे। जैसे हे वैसे। ऐसे।आप का जन्म कहा, कब, क्यू हुआ? इस सवाल का जवाब नही।

आप पढे-लिखे हो? कितने पढे हे?

हम कुछ जादा ही पढे लिखे हे। इसलिए बेकार हे। हमारे लायक नौकरी-व्यवसाय अब तक पैदा ना हुए। इसलिए बेकार हे। हमारी पुश्तोंकी जायदाद हे, इसलिए कुछ नही करते। { ऐसे मत बताओ }। बताओ जितना जरुरी हे पढ़ लिये। पढ़-लिख पाते हे, हिसाब कर पाते हे। प्रभु की कृपा हे।

आप क्या काम करते हे?

हर काम करे बदनाम, भोला निरंतर निष्काम, श्रीसंतगुरुवचन अंतिम आराम, आदेश राम नाम।

{ ऐसे मत कहना }। कहना कुछ छोटा-मोटा काम कर लेते हे। बचे समय प्रभु भजन होता हे।

आप कुछ तो रोजाना काम करते होगे !?

हाँ। कुछ नही-करते, नही-करते, नही-करने मे ही, कितना कुछ हो जाता हे। जीस परिस्थिति, जिस पल, जो जरुरी हे, वो हम से होता हे। पूरी लगन से, हक से, शौक से, काम जारी हे, हम व्यस्त हे। मस्त हे। तंदुरुस्त हे, चुस्त हे। भोले जबरदस्त हे।रे ऽऽ सच्चे ! हम जिस लायक हे, वही हमसे होता हे।

आप की कमाई? खर्चा पानी? गुजारा? कैसे होता हे?

आपकी सहायता से। जिसने पैदा किया, जिसने अबतक पाला, उसकी कृपा से। वैसे अब कुछ और जरूरत नही। सत् काम जारी हे। जो हे, वो सब कुछ हे। अब जितना हे, पर्याप्त हे। अच्छे से गुजारा हो रहा हे। दुनिया पे बोझ नही हमारा, ना दुनिया हम पे बोझा हे।

आपका धर्म? और जाती?

सनातन मनुष्य धर्म, जाती और जीवन।

क्या आप अध्यात्म मे हे?

आपके गुरु कौन हे? कहा हे? क्या वो जिंदा हे? क्या उनसे बात हो सकती हे? क्या उन्हे मिल सकते हे?क्या आप उन्हे अक्सर मिलते हे?

ॐ सच्चे! स्वच्छंद नाथ गुरु-तत्व हे। गुरु-नाम, किसी देह का नाम नही। गुरु कोई देह नही, वो साक्षात् तत्व हे। अपने हर अनुभव से सीखने की, और सीखी जीवन मे उतारने की, जो असीम शक्ति हे, वह गुरु अनुग्रह हे। गुरु-बिन ये नामुमकिन हे।

शिष्य के हृदय, गुरु प्रकट होते हे। गुरु कुछ सिखाते नही, शिष्य गुरुसे सिखता हे। शिष्य का महत्व हे। अगर शिष्य सक्षम हो, तो जगत मे ऐसी कोई ताकत नही, जो आपको स्वयं परिचय से रोक पाए। गुरु वचन सत्य वचन।

रे ऽऽ सच्चे ! शिष्य गुरु से चिपकते नही, और गुरु चिपकने देते नही। हम कच्चे गुरु के चेले नही, जो की सत् गुरु कच्चा होता ही नही, वो तो पक्का पका, ताजा ज्ञानामृत हे। गुरु-शिष्य एक ही चैतन्य हे। वही एक, गुरुपद धारण किए अनुग्रह कारक हे, और वही शिष्यबन गुरुआदेश श्रवण ग्राहक हे। सब एक ही हे, मानो दो में बटा नजर आता हे। गुरु-शिष्य ये रिश्ता नही, यह निष्काम प्रेम का नाता हे, जो एक दूसरेको जखड़ता नही, उलझाता नही बलकि असंगता, स्वतंत्रता से सहज सुलझाता हे।

गुरु सेवा? गुरु दक्षिणा?

सच्चे! गुरुवचन-सत् वचन मानकर, फिर जानकर, फिर परिधानकर, सहज-सावधान, सदा-चेतन, जीवन अनुभव, जो स्वानन्द की अभिव्यक्ति हो। ऐसा स्वात्मभान ही सत् सेवा हे। सच्चे! सत् गुरु कोई सेवा-दक्षिणा लेते नही। सत् शिष्य सेवा जताते नही।

रे सच्चे! सदा साधक रहो, कभी किसके गुरु मत बनो, मार्ग-दर्शक भी ना बनो। बस मित्र भाव से रहो, समत्व भाव से रहो।

इस गुरु-शिष्य झमेले मे उलझो मत। कही किसी गुरु या आश्रम से बन्धो मत। आजीवन साधक हो, साधक ही रहो। असंग रहो, स्वतंत्र रहो। बलकि इस बारेमे, बात भी मत करो, और मत सोचो।

कुछ कल बीते बुरे कर्मो का बोझा?

नही। जो कुछ अच्छा बुरा अज्ञानी से हुआ, सब धूनी भस्म हो गया। साथ साथ अज्ञानी कर्ता भी भस्म हो गया। पर सीख भस्म ना हो पाई, सदा चेतन हे। जो अच्छा बुरा काम हुआ, सो हुआ। पर अपने गलती से सीखा, और वो गलती वापस ना दोहराई। अब ना कोई बोझा, ना ही कोई गधा।

कुछ आनेवाले कल की चिंता?

नही। कोई चिंता नही। जैसे चीताह मुर्दा जलाती, वैसे चिंता जिंदा जलाती। इस पल मे पूरा-पूरा जी लेते हे। ऐसे पल पल जो खिलता हे, गाता हे, झूमता हे। जो स्वस्थ हे, व्यस्त हे, चुस्त हे, मस्त हे, जबरदस्त हे, वो जीवन हे। हम जीव नही, हम जीवन हे। सत् निरंतर निरंजन हे।

शिवलोक! कहा?

जहा अपरिवर्तनीय-परिवर्तन। वैराग्य-ऐश्वर्य उन्मिलन। ज्ञान-भक्ति सम्मेलन। साक्षात शिव-शक्ति आंदोलन।

एक जो मानो दो मे बटा। पर बटा नही, एक ही समाया। स्वच्छंद स्वतंत्र असंग अलमस्त।

अलख निरंजन

ॐ अघोर आदेश, , ,

सुस्वागतम्

अऽउऽम

रे ऽऽ सच्चे ! सही जगह पधारे।

ऽऽ आरपार ऽऽ एक जबर सत् घुमाव ऽऽ एक दिन मे नही सही, एक दिन प्रभु कृपा से हो जाता हे।

ये साधक जीवन एक अखंड परिक्रमा हे, अघोर-आनंद यात्रा हे। बस इस रास्ते चलते चलो। इस राह पे डटके चलना, ही अंतिम मुकाम हे।

ये सबके बस की बात नही। हम उसे नही, वो राह हमे चुनती हे।

सब लिखा हे, अगर ऽ कोई ऽ पढ़ लिया।

वो रस्ता दिखाया, अगर ऽ कोई ऽ चल दिया।

जो जान पाया, जान पाया। जो डूब गया, सो बचगया ।॰

जो मिला खुद-से, खुद-को, जैसे के तैसे ऽऽ आरपार ऽऽ, वह अघोर-आनंद समाया।

बाकी सब अपने-अपने जगह ठीक हे, पर उन-उस सब में वो बात नही, वो बस ऊपरी-ऊपर हे, पर अपार-अपरमपार, ऽऽ आरपार ऽऽ नही।

रे ऽऽ सच्चे ! सदा सावधान, इक-पल ना छूटे आत्मभान।

॰॰। कच्चा मोह-संसार, सच्चा ऽऽ आरपार ऽऽ ।॰॰

जय हो ! सच्चे की।॰

“इस यात्रा मे आपका सदा स्वागत हे।”

ॐ अघोर आदेश, ,

ॐ आरपार आदेश

एक जबरदस्त घुमाव

साधक नित्य-नूतन जीता हे, ये यात्रा अखंड हे।

साधक स्वयं एक अनुभव-शृंखला से गुजरता हे, हर अनुभव कुछ सीखता हे। जो जाना, बन जाता हे। ये सत्संग-चर्या, साधक स्वयं की जरूरत, मोहब्बत हे। हसते-गाते वक्त अच्छा गुजरता हे। सब अघोर आनंद भजन साधन हे।

ये साधन-चर्या स्वयं अनुस्मारक हे। ये ‘सत्संग-साधन-शृंखला‘, पूज्य सत्गुरु प्रसाद हे।

तथा साधु-संत-परम-परा-वाणी, सत्-गुरु सत्-वचन की गूंज हे। जो हृदय से आरपार होके, अस्तित्व से टकराती हे। सब मोह मिटाती हे, खुद को-खुद से मिलाती हे। अब अस्तित्व का अलग से कोई नामो निशान नही। सब आरपार

साधक जब सत्-गुरु अनुग्रह अपार-कृपा-प्रसाद पाता हे, गुरु-मंडल गुरु-तत्व जुड जाता हे, सब धन्य-धन्य हो जाता हे। स्वयं में एक अपूर्व अमुलाग्र बदलाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

जीवन मे एक ज़बरदस्त घुमाव आता हे। सब धन्य-धन्य हो जाता हे।

॥ स्वान्तः सुखाय। ओम नमः शिवाय ॥

ॐ अघोर आनंद

आरपार आदेश

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ॐ अघोर आदेश,
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