कौन हे आप?
रे ऽऽ आरपारी ! एक ही पहचान हमारी, हम भोले के चेले, स्वतंत्र स्वच्छंद अकेले।
रे ऽऽ सच्चे ! स्वयं के बारेमे, स्वयं ही बतलाना, बिलकुल जरूरी नही।
दुनिया तो सवाल करेगी, तो जवाब देना जरुरी नही। पर भीतर जवाब पता होना, जरुरी हे।
सवाल कुछ नये नही, बस वही-वही, वही-वही। इन लाजवाब सवालो का कोई जवाब नही।
क्या? क्यों? कौन? कैसे? कब? कहा? ऐसे सवाल, सब बवाल। तू ना इन्हे चारा डाल, तू खुद को संभाल।
इनसे बचो। पर इन खातिर एक-बारी, स्वयं से स्वयं ही पूछ लेना। आज का सच, सच बताना। प्रश्न से मुक्त हो जाना।
रे ऽऽ सुन ! कुछ सवाल जो ‘कभी किसी से ना पूछने चाहिये’। कुछ वही सवाल जो ‘सबसे जादा पूछे जाते हे’। और उनके सच्चे जवाब – जो कभी ना देना, ये सवाल ही अटकाते-भटकाते हे।
आपका नाम क्या हे?
नाम नाम-मात्र हे, राम-नाम महा-मंत्र हे।
जो आपको जैसे पुकारे वही आपका नाम।
वो जो पुकारे भाता हे, सच्चे ! प्यार का नाता हे। जो पूरा-पूरा जीता हे, आरपार कहलाता हे।
माँ-बाप ने रखा नाम?
माता-पिता ने देह को जन्म दिया, देह को नाम दिया। वो जादा ना टीका, धुल गया। मरने से पहिले ही, पुनर्जन्म साकारा, गुरुतत्व अस्तित्व पुकारा, “ ऽऽ आरपार ऽऽ ॐ अघोरआनंद”।
असली नाम?
नकली वस्तु का असली नाम नही होता।
आप कहासे हे?
यहा से। अभी जहा हे, वहा से।
कहाके रहने वाले? पता?
अभी जहा हे, वहा! याने यहा।
आपका माँ बाप? परिवार?
सारा जगत परिवार हमारा, सनातन सत् सहारा। बाप-भोले, माँ-तारा, शिव-लोक संसार हमारा।
हम सब भूल गये।अब सब रिश्ते-नाते बस सुहृद मित्र समान लगते हे। अब कोई विशेष संबंध नही।पर सत् संबंध हे।
पर यहा कैसे?
ऐसेही भ्रमण करते, यहा पधारे। जैसे हे वैसे। ऐसे।आप का जन्म कहा, कब, क्यू हुआ? इस सवाल का जवाब नही।
आप पढे-लिखे हो? कितने पढे हे?
हम कुछ जादा ही पढे लिखे हे। इसलिए बेकार हे। हमारे लायक नौकरी-व्यवसाय अब तक पैदा ना हुए। इसलिए बेकार हे। हमारी पुश्तोंकी जायदाद हे, इसलिए कुछ नही करते। { ऐसे मत बताओ }। बताओ जितना जरुरी हे पढ़ लिये। पढ़-लिख पाते हे, हिसाब कर पाते हे। प्रभु की कृपा हे।
आप क्या काम करते हे?
हर काम करे बदनाम, भोला निरंतर निष्काम, श्रीसंतगुरुवचन अंतिम आराम, आदेश राम नाम।
{ ऐसे मत कहना }। कहना कुछ छोटा-मोटा काम कर लेते हे। बचे समय प्रभु भजन होता हे।
आप कुछ तो रोजाना काम करते होगे !?
हाँ। कुछ नही-करते, नही-करते, नही-करने मे ही, कितना कुछ हो जाता हे। जीस परिस्थिति, जिस पल, जो जरुरी हे, वो हम से होता हे। पूरी लगन से, हक से, शौक से, काम जारी हे, हम व्यस्त हे। मस्त हे। तंदुरुस्त हे, चुस्त हे। भोले जबरदस्त हे।रे ऽऽ सच्चे ! हम जिस लायक हे, वही हमसे होता हे।
आप की कमाई? खर्चा पानी? गुजारा? कैसे होता हे?
आपकी सहायता से। जिसने पैदा किया, जिसने अबतक पाला, उसकी कृपा से। वैसे अब कुछ और जरूरत नही। सत् काम जारी हे। जो हे, वो सब कुछ हे। अब जितना हे, पर्याप्त हे। अच्छे से गुजारा हो रहा हे। दुनिया पे बोझ नही हमारा, ना दुनिया हम पे बोझा हे।
आपका धर्म? और जाती?
सनातन मनुष्य धर्म, जाती और जीवन।
क्या आप अध्यात्म मे हे?
आपके गुरु कौन हे? कहा हे? क्या वो जिंदा हे? क्या उनसे बात हो सकती हे? क्या उन्हे मिल सकते हे?क्या आप उन्हे अक्सर मिलते हे?
ॐ सच्चे! स्वच्छंद नाथ गुरु-तत्व हे। गुरु-नाम, किसी देह का नाम नही। गुरु कोई देह नही, वो साक्षात् तत्व हे। अपने हर अनुभव से सीखने की, और सीखी जीवन मे उतारने की, जो असीम शक्ति हे, वह गुरु अनुग्रह हे। गुरु-बिन ये नामुमकिन हे।
शिष्य के हृदय, गुरु प्रकट होते हे। गुरु कुछ सिखाते नही, शिष्य गुरुसे सिखता हे। शिष्य का महत्व हे। अगर शिष्य सक्षम हो, तो जगत मे ऐसी कोई ताकत नही, जो आपको स्वयं परिचय से रोक पाए। गुरु वचन सत्य वचन।
रे ऽऽ सच्चे ! शिष्य गुरु से चिपकते नही, और गुरु चिपकने देते नही। हम कच्चे गुरु के चेले नही, जो की सत् गुरु कच्चा होता ही नही, वो तो पक्का पका, ताजा ज्ञानामृत हे। गुरु-शिष्य एक ही चैतन्य हे। वही एक, गुरुपद धारण किए अनुग्रह कारक हे, और वही शिष्यबन गुरुआदेश श्रवण ग्राहक हे। सब एक ही हे, मानो दो में बटा नजर आता हे। गुरु-शिष्य ये रिश्ता नही, यह निष्काम प्रेम का नाता हे, जो एक दूसरेको जखड़ता नही, उलझाता नही बलकि असंगता, स्वतंत्रता से सहज सुलझाता हे।
गुरु सेवा? गुरु दक्षिणा?
सच्चे! गुरुवचन-सत् वचन मानकर, फिर जानकर, फिर परिधानकर, सहज-सावधान, सदा-चेतन, जीवन अनुभव, जो स्वानन्द की अभिव्यक्ति हो। ऐसा स्वात्मभान ही सत् सेवा हे। सच्चे! सत् गुरु कोई सेवा-दक्षिणा लेते नही। सत् शिष्य सेवा जताते नही।
रे सच्चे! सदा साधक रहो, कभी किसके गुरु मत बनो, मार्ग-दर्शक भी ना बनो। बस मित्र भाव से रहो, समत्व भाव से रहो।
इस गुरु-शिष्य झमेले मे उलझो मत। कही किसी गुरु या आश्रम से बन्धो मत। आजीवन साधक हो, साधक ही रहो। असंग रहो, स्वतंत्र रहो। बलकि इस बारेमे, बात भी मत करो, और मत सोचो।
कुछ कल बीते बुरे कर्मो का बोझा?
नही। जो कुछ अच्छा बुरा अज्ञानी से हुआ, सब धूनी भस्म हो गया। साथ साथ अज्ञानी कर्ता भी भस्म हो गया। पर सीख भस्म ना हो पाई, सदा चेतन हे। जो अच्छा बुरा काम हुआ, सो हुआ। पर अपने गलती से सीखा, और वो गलती वापस ना दोहराई। अब ना कोई बोझा, ना ही कोई गधा।
कुछ आनेवाले कल की चिंता?
नही। कोई चिंता नही। जैसे चीताह मुर्दा जलाती, वैसे चिंता जिंदा जलाती। इस पल मे पूरा-पूरा जी लेते हे। ऐसे पल पल जो खिलता हे, गाता हे, झूमता हे। जो स्वस्थ हे, व्यस्त हे, चुस्त हे, मस्त हे, जबरदस्त हे, वो जीवन हे। हम जीव नही, हम जीवन हे। सत् निरंतर निरंजन हे।
शिवलोक! कहा?
जहा अपरिवर्तनीय-परिवर्तन। वैराग्य-ऐश्वर्य उन्मिलन। ज्ञान-भक्ति सम्मेलन। साक्षात शिव-शक्ति आंदोलन।
एक जो मानो दो मे बटा। पर बटा नही, एक ही समाया। स्वच्छंद स्वतंत्र असंग अलमस्त।
अलख निरंजन