ऐसा सब
अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी
वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।
ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,
अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।
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अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।
हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।
कुछ पाना खोना नहीं।
कही आना जाना नहीं।
कोई अपना पराया नहीं।
सब एक हे।
*
स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।
दुनिया बस मन की भ्रांति हे।
मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।
अब कुछ फरक नहीं पड़ता।
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MIND BLENDING,
MIND BENDING!
MIND ENDING.
“MIND yo!ur MIND”
