माँ

ऐसा सब

अब वो माया शक्ति, जो हमें यहा वहा नचाती थी

वही, माँ स्वरूप हमारा, आध्यात्मिक पालन पोषण करती हे।

ज्ञान स्वरूप शिव, परम पिता गुरुदेव प्रकाश बने,

अखंड आनंद भजन धूनी, हमारे हृदय चिता रहे हे।

*

अब जो हे वो हे, जैसा हे वैसा हे।

हमसे जो भी होना हे, हो रहा हे।

कुछ पाना खोना नहीं।

कही आना जाना नहीं।

कोई अपना पराया नहीं।

सब एक हे।

*

स्वरूप दर्शन, परम शान्ति हे।

दुनिया बस मन की भ्रांति हे।

मन तो सत्चिदानंद लय हो गया हे।

अब कुछ फरक नहीं पड़ता।

~

MIND BLENDING,

MIND BENDING!

MIND ENDING.

“MIND yo!ur MIND”

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान, ,

अवधू अघोर आनंद

अवधूता, अवधूता

गीत गाता

प्रभु-प्रीत जगाता

सत्संग समाता

असंग जीता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

धूनी रमाता

अलख लगता

चिलम चिताता

शून्य मे रमता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

खूद को खोता

गगन समाता

ना कभी जीता

ना कभी मरता

अवधूता

*

अवधूता, अवधूता

कुछ नहीं करता

दिख नहीं पाता

बन सबकी माता

विश्व चलाता

अवधूता

*

आदेश नाथ गुरु शिष्य सहारा

सत् गुरु वचन संजीवन गीता

अवधूता, अवधूता

~

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, , , ,

साधक प्रेम / संबंध

प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।

भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।

जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।

धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।

॥ ओम अघोर आनंद ॥

साधक

सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।

शिव – चित् + आनंद शक्ति

चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।

शिव शिव शिव कल्याण करी ।

चित्-विलास = आरपार

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , , ,

जय माँ

जय माँ अघोरेश्वरी आल्हादिनी स्वतंत्र तारा,

परमेश्वरी, महादेवी, मुक्ता, (त्रिशूला) माता मधुरा

काली, दुर्गा, शक्ति, शांभवी, शिवा परापरा

*

चण्डी, चामुंडा, कपालीका, त्रिशूला (शूरा, वीरांगना)

भगवती, शांकरी, तापसी, जगत जननी

शैलजा, जया, गिरिजा, उज्वला, वंदना

परा अपरा परापरा

तुम ही, सब हो, तुमने ही सवारा

तेरी प्रीत, तेरी एक तुम हो सहारा

तेरी प्रीत, हर गीत, संगीत सतत धारा

चण्डी, महाकाली, भयभीत असुर मारा

जननी, जगत जननी, संसार जगत तारा

~

अघोर आनंद भजन, , ,
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