ओ भोले साधक!
परमार्थ में मन नहीं लगता,
मन संसार स्वार्थ में रमता,
जप जाप ताप सा भाता
अब क्या करे साधक?
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ओ भोले साधक!
मन लगने से जप नहीं होता,
जप जपनेसे से मन लगता हे,
स्वरूप साधना में।
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जीवन में साधना की नहीं जाती,
साधना में जीवन जीते हे,
जीवन ही साधना हे,
सदा सर्वदा।
