खेल

खेल
.
इस जिंदगी के खेल में
कुछ हार हे, कुछ जीत हे ।
सब कुछ यहाँ पर कुछ नहीं
ऐसी अजीबो रित हे ।
.
क्या सही क्या हे नहीं …?
क्या सही क्या हे नहीं
इस खोज में खोता रहा ।
ढूंढे कहानी अनकही
हर दिशा में जा रहा ।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ॥
.
क्यों किया ? कैसे किया ?
कुछ ये किया कुछ वो किया
अच्छा लगा अपनालिया ।
कुछ ये किया कुछ वो किया
जो था गलत दफानादिया ।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ॥
.
में कही मंजिल कही?
में कही मंजिल कही
और क्या बनी ये जिंदगी।
तू सही बस तू सही
तेरे सिवा कोई नहीं।
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी
ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी ||
.
इस जिंदगी के खेल में
अब क्या बचा आराम हे ?
इस जिंदगी के खेल में
अब क्या बचा आराम हे।
तू वो ही कर जो मन में हे तेरे
बस वो ही कर जो मन में हे तेरे।
.
बस वो ही कर जो मन में हे
बस वो ही कर जो मन में हे
हर काम में फिर राम हे ।
.
तू वो ही कर जो मन में हे
हर काम में फिर राम हे ॥
राम हे ।
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…

1 thought on “खेल”

Leave a Reply to रजनी की रचनायें Cancel Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top
0

Subtotal