जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?
अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।
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अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?
और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?
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कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।
कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥
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कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।
ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥
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बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई
फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई
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अब, जागो साधक प्यारे
बाद में क्यू पछता रे?
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एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।
तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥
