आत्माचिंतन

कैसे

जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।

जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?

जाग जा साधक, जग जा साधक,

यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,

हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।

~

आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, ,

सवालजवाब

सवाल एक ही था, एक ही है, एक ही रहेगा।

मै कौन हूँ? दुनिया क्या है? 

यहा क्या हे मेरा वास्ता?

क्या हे वो रास्ता?

*

भगवान है? नही?

*

अगर है ही नही भगवान

तो बस बने रहो इन्सान।

भोग मगन हैवान

चंद पल के मेहमान।

*

मानो वो है।

तो क्या है वो?

*

जवाब एक ही है

मै हूँ।

बस हूँ।

कुछ नही, कोई नही, कभी नही।

सब कुछ, हर कोई।

*

जरा सोचो साधक भोला

कर ले खुद, खुद की पहचान

कितना जीया बने अंजान

तू तो अपने घर मेहमान

*

पता ज़रूरी हे

काम जारी हे

आत्माचिंतन, ,

अपना कुछ भी नहीं

जो होना हे

हो रहा हे।

आना जाना।

अपना कुछ भी नहीं।

ना हमने कुछ किया हे।

ना कुछ कमाया हे।

जो आपका हे, वो आपका हे।

जो नहीं हे, वो नहीं हे।

ये दुनिया एक सुंदर बगीचा हे।

करोड़ों फूल खिलते हे यहाँ।

मुरझाते भी हे।

अपना कुछ नहीं।

सब हो रहा हे।

एक सास अंदर 

एक सास बाहर

आप जी रहे हो।

वो जीवन भी आपका नहीं

सब हो रहा हे।

अपना कुछ नहीं।

*

जो अपना हे नहीं

वो अपना समझो मत

उसका मालिक ना बन।

नहीं तो वो चोर कहलाए।

वैसे डकैत तो हो ही आप

जो देह भी अपना नहीं 

उसे खुद मानके चले

चोर कहिके।

अपना कुछ नहीं।

~

आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, , ,

दो कहा हे?

सवाल एक ही था

एक ही हे

एक ही रहेगा।

में कौन हूँ?

~ होशियार को जगत में बस एक ही सवाल होता हे।~

साला में हूँ कौन?

जवाब एक ही था

एक ही हे

एक ही रहेगा।

कुछ नहीं। कोई नहीं। कभी नहीं।

सब कुछ। हर कोई। हर कही।

वो भी नहीं, ये भी नहीं।

सब कुछ। कुछ नहीं।

सब {कुछ} नहीं।

सदा स्वस्वरूप

*

{ आदेश }

कुछ बन मत साधक

ना ईश्वर, ना गुरु, ना संत, ना भगवान।

जब तक यह हे

साधक हे।

जब साधो हर पल,

तो साधक।

*

गुरुक्रिपा असीम अपार।

गुरुमाई वात्सल्य चमत्कार।

आत्म चिंतन ही परमेश्वर चिंतन

आत्म ज्ञान ही परमेश्वर ज्ञान

आत्म कृपा ही ईश कृपा

{ गुरु वचन – सत्य वचन }

दो कहा हे? कहा हे दो!?

~

बस चिंतन करना हे, भोले!

आत्माचिंतन, ,

उद्यमो भैरव:

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।।ॐअघोरआदेश।।

*

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

*

ॐअघोरआदेश आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द नादसाधनासत्र नाम:स्मरण संतपरमपरावाणी स्तोत्रांजली, , , , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु भजन में हे,

जो आनंद तत्व चिंतन में हे,

जो आनंद विषय त्याग में हे {वो भोग में नहीं},

जो आनंद एकांत में हे {संग में नहीं},

*

जो आनंद ध्यान में हे,

जो आनंद मौन में हे,

वो सहज आनंद,

हम से हे, हम में हे, हम ही हे।

*

वो सहज आनंद अपना स्वरूप हे।

वो आनंद राम मय हे।

वो राम आनन्दमय हे।

वो राम ही स्व स्वरूप हे।

*

जगत में हम नहीं, जगत हम में हे।

हम हमेशा हे थे रहेंगे।

हमारा कुछ नहीं।

सब कुछ राम हे।

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे।

आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, ,
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