नित्यप्रलय

परम शिव नित्यप्रलय आलय

यहाँ कुछ मिलता नहीं, सब छूट जाता हे । जो भी कुछ स्वयं को बंधा रखें, वो यहाँ नाम शेष होता हे। इस आलय में साधक का आना ही पर्याप्त हे। आप कौन हो इसका खुद को ज़ाहिर होना स्वाभाविक अपेक्षा हे, चौकन्ना होना पड़ेगा। अगर आपकी गुमनाम पहचान भीतर साधक मालूम होती हे, तो यहाँ आपका स्वागत हे।

अनजानी में संसारी यहाँ माथा टिकाए, उसका संसार छूट, मिट जाएगा, तो वह भी विरक्त विरागी बन, अघोर भैरव अंत: अलख पुकारेगा। तो यह समझदारी से आना होगा। यहाँ भगोडो का कोई काम नहीं, यहाँ स्वयं सिद्ध विहार करते हे।

ये स्थान दुनिया दारी का नहीं, ये अखंड सत्संग आनंद साधक धूनी हे।यहाँ चिंता नहीं, चिंतन करो। श्रवण करो, स्मरण करो। मौन रहो। चिंतन से ध्यान दो। यहाँ परम शिव स्वयं नित्य प्रलय अनुभव, सचेतन विराजमान हे। यहाँ साधक अपना रास्ता खुद ही जान लेता हे। परमेश्वर को खोजता नहीं, परमेश्वर में खो जाता हे। और फिर कोई वापसी की सम्भावना नहीं । संत परम पर वाणी सुन, जीवन मुक्तछंद में, आनंद भजन आप सुख साक्षात परम शिव आत्म प्रकट हो, राम नाम महिमा साधक खुद अनुभव करता हे। साधन सत गुरु देव आदेश हे। स्वयं समर्पण सन्यास हे।

ये आनंद यात्रा ही मुक़ाम हे, यह कही आना जाना पोहोचना नहीं। खुद ही खुद को पाना हे। स्वरूप गान गाना हे। साधना साधन क्या हे? खुद स्वभाव से हटकर, स्वरूप में स्थित होना हे। जागना हे।

जग जा साधक।

ॐ अघोर आदेश

यहाँ हज़ार बार सोचके माथा टिकाओ, नहीं तो बरबाद हो जाओगे।यहाँ हज़ार बार सोचके माथा टिकाओ, यहाँ इच्छा, आकांक्षा, कामनाओकि पूर्ति बिलकुल नहीं होती। ये अघोर मसान हे, यहाँ खुद को मिटाने का अभ्यास होता हे। आनंद दहन में साधक स्वयं स्वयं का अंत्य संस्कार करता हे, ज्ञान ज्वाला से देहात्म भाव और जीवात्म भाव की भ्रांति, भस्म हो जाती हे।

साधन प्रति समर्पित हो तो नत मस्तक हो जाओ, तो खुद से आज़ाद हो जाओगे।स्वयं की मुक्ति नही होती, स्वयं से मुक्ति होती हे। ये ईश्वर कृपा, सत गुरु देव कृपा और आत्म कृपा का आविष्कार हे। स्वरूप दर्शन ही विश्वरूप दर्शन, ईश्वर दर्शन, परमात्म दर्शन हे।

आत्म समर्पण ऐसा कुछ नहीं होता। आत्म में समर्पण होता हे, स्वयं का। यह होना ही संन्यस्त होना। एक सम्पूर्ण अवस्था मात्र अनुभव का विषय हे। बोध होता हे। चिंतन जारी रख साधक। जान ले यह इंद्रिय मन बुद्धिके परे हे।

ये बुद्धि के परे हे, ये पहचान ही ज्ञान की पराकाष्ठा।

ये मन के परे हे, बलकी मन इसमेही विराजमान हे, ये पहचान भक्ति की पराकाष्ठा।

सत गुरु समर्पण, ये अहम का निराकरण हे। सत में विलीनीकरण हे।

सम्पूर्ण आत्म ही परमात्म हे। सत ही चित ही आनंद ही सत हे।

सहजता ही संत की सम्पूर्ण पहचान हे।

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