आकाशविश्ववाणी

सब तेरा

सब तेरा
.
ये जमी या आसमा
ये हर दिशा तेरी
.
ये रंग भी सुगंध भी
खुली हवा तेरी
.
ये चन्द्रमा ये तारका
ये सूर्य भी तेरा
.
ये कारवा ये पासबा
ये गुलसिता तेरा
.
ये जिंदगी तेरेनाम हे
ये रोशनी तेरेनाम हे
.
ये ख्वाइशे ये चाहते
ये मुश्किलें तेरी
.
ये सुकून ये शांतता
ये दर्द भी तेरा
.
मेरा मन मेरी घडन
जो हे मेरा तेरा
.
ये आत्मा शरीर भी
ये जीवन तेरा
.
ये जिंदगी तेरेनाम हे
ये रोशनी तेरेनाम हे
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘जाना – बनजाना’
काम जारी हे…

आकाशविश्ववाणी

राधेशाम

राधेशाम
.
पानी में मछली बने
तू पंछी बने आसमा में
लाखो हे रूप तेरे
तू ही हर दिशा इस जहा में
राधेशाम राधेशाम
.
में जी रहा हु इस माया नगरिया में
तेरी परछाई मेरी छाव हे
अब तुझसे में क्या सब छुपाऊ
तुनेही लिखी ये कहानी
में खुदसे यु अब न जी पाउ
तेरे नाम हे जिंदगानी
.
अंधेरोमे सूरज बने
तू पानी बने रेगिस्तान में
तू धुप में तरुवर बने
तुही हर दिशा इस जहामे
राधेशाम राधेशाम
~
॥ विश्वामित्र ॥
कविता संग्रह ‘हरिहर हरिहर’
काम जारी हे…

आकाशविश्ववाणी

साधक परिचय

एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।

{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}

बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?

साधक: जी बोलिए, महाराज।

बुढ़ाऊँ: आप का नाम?

साधक: साधक भोला राम भरोसे

बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?

साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।

बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।

साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।

बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?

साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।

साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?

बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।

साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।

{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}

बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?

साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।

बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?

साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।

साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।

बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!

साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?

बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।

साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?

बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।

साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।

शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।

बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?

आकाशविश्ववाणी

भूल

हम कैसे हे?

आप ने बोहोत बारी पूछा हमें।

हम कुछ बता ना पाएँ

और भूल भी गये पूछना

आप कैसे हो भाई!

ये भूल भी क्या चीज है भोले

भूल से ही भूल जाते है॥

निकम्मे है, कुछ करने को नहीं

तो जाम बनाते है

बीड़ी जलाते है

तेरा नाम गाते है।

खुद को खुद ही भुला बैठे

अब बदनाम कहलाते है।

ये भूल भी क्या चीज है भोले

भूल से ही भूल जाते है॥

आकाशविश्ववाणी

क्षण

इस क्षण

कितना सुकून हे,

शांति हे, आनंद हे

ये क्षण स्वयं सम्पूर्ण हे।

इस पल के परे

कहा हे ज़िन्दगी?

जीवन मुक्ति का रहस्य

इस पल में छुपा हे।

आकाशविश्ववाणी

रघुपती तुम बीन कैसे संवारे

आसमान में लाख है तारे

उन सब में दिखते चेहरे तुम्हारे

मूढ़ भगत जब मती मन खोवे

तोरे दर्शन तब सुध बुध पावे

तोरे नाम प्रीत स्वर गावे

वो उन्मन मंदिर बन जावे

रघुपती तुम बीन कैसे संवारे

जीवन नैया पार पधारे

आसमान में लाख है तारे

उन सब में दिखते चेहरे तुम्हारे

आकाशविश्ववाणी

जिये जिये संसार जिये क्या?

अंदर बाहिर कुछ नहीं होना

अंदर बाहिर सही पहचाना

ख़ुशबू सच हे फूल बहना

अंदर सच हे बाहर आइना

अंदर बाहिर एक ही हो जाना

मन मती जीवन माटी होना

खुद की छबी को खुद ही मिटाना

पा के खोना, खो के पाना

एक ही जनम में अनंत मिल जाना

कभी ना भूलो भूलना खुद को

कभी ना जीना खुद का जीना

सब सच संचित समय परे हे

समय समय ना सच को भुलाना

प्रति दिन जीना

प्रति दिन मर जाना

प्रति दिन जगाना

प्रति दिन सो जाना

जिये जिये संसार जिये क्या?

कर बैठे व्यापार रे

~

लाखों शब्द हे

एक हे।।।याद हे??

आकाशविश्ववाणी

BHAJAN WIP

पहिले तो वह बस ही गये हम थे,

जो न हमारा धाम हे।

मद मस्त सयाने खुद को कहकर,

करते जो न हमारा काम हे।

असुरा वृत्ति, बेसुरा वाणी

नारी नशा आराम हे

आकाशविश्ववाणी

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो जो सर्वत्र है, और हे नही

वो सदा यह ही था।

वो भूलसे,

खुद को भूल जाता है

उसका जन्म होता है

वो नाम रूप पाता है।

जो जाना है, 

वो जीता है

जब सीखे वो हर पल

तब साधक कहलाता है।

जग जाता है, जागता है, जगाता है।

हिसाब के परे जीता हे।

जीवन संगीत गाता हे।

~

“जो जाना, वो बन जाना

अब कही ना आना जाना।”

~

“जो ज्ञान वो जीवन उतरा

वो ज्ञान से राह मिलेगी।”

~

“जब हृदय प्रभु प्रीत खिलेगी

तब प्रेम की नदी बहेगी।”

~

अरे सुन, प्रभु भजन मगन दीवाने

हम जाने तेरे बहाने।

*

आकाशविश्ववाणी

दो कहा है?

हर समस्या के पीछे कोई व्यक्तित्व होता है।

जब ये व्यक्तित्व ही मिट गया तो कैसी चिंता?

किसको चिंता?

फिर क्या बाक़ी ?

फिर चिंता नहीं।

चिंतन सही

अखंड प्रभु चिंतन।

अनुभूति समुद्र मंथन।

कुछ नहीं बचेगा। 

आप भीनहीं बचोगे।

न साधना, ना साध्य, ना साधक

सब विलीन हो जाएगा 

दूजा तो अब कुछ रहा ही नहीं 

और क्या ही कुछ रहा सही?

*

ये अब तक कोई किसी को, 

लब्जों में न बता पाया।

वो कोशिश करता रहा 

वो जताने की

*

वो जीवन संगीत बन गया 

चरित्र साधु साधु हो गया 

जो जो अपनाया सब चला गया

अपनापन भी चला गया

*

गुरु कृपा असीम अपार है

गुरुजन प्रेम चमत्कार है

*

आत्मचिंतन ही परमेश चिंतन

आत्मज्ञान ही परमेश ज्ञान

आत्म कृपा ही परमेश कृपा

दो कहा है?

आकाशविश्ववाणी

स्वर्गवासी

आप जहा जैसे हो इस वक्त

उसके परे कोई स्वर्ग नही

*

अगर

आप जान पाओ 

तो

मुमकिन है

*

नही जान पाओ 

तो 

मुश्किल है

*

ऐसा ही है

आकाशविश्ववाणी

विधि निषेध

ये दुनिया नश्वर है

इसमे अपना दम ना घुटाओ

गहरा दम लगाओ

सदा आनंद में रहो

*

विधि निषेद की विधि

विधि निषेद का निषेद

ये हे

साधक भोले

आकाशविश्ववाणी

कैसे

जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।

जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?

जाग जा साधक, जग जा साधक,

यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,

हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।

~

आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, ,

तू साधु

\"\"
साधु साधु

मानले

जानले

आनंद ले

जानके

*

तू साधु

*

जीवन मुक्त

*

तू साधु

*

सेवा धर्म तेरा

हृदय प्रेम भरा

साधना कर्म तेरा

तू साधु

*

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन, , ,

आप साधक हो

संन्यासी साधक हे।

संसारी साधक हे।

साधु भी साधक हे।

सिद्ध भी साधक हे।

संत भी साधक हे।

गुरु भी साधक हे।

शिष्य भी साधक हे।

मुमुक्षु भी साधक हे।

महात्मा भी साधक हे।

आप भी साधक हो।

बस साधक ही रहो।

*

और एक बात,

साधक की कोई पहचान नहीं होती।

वो सब में मिला हे,

पर सब के परे हे।

इर्द गिर्द दिखता नहीं,

पर रहता हे।

~

आकाशविश्ववाणी,

उद्यमो भैरव:

\"\"
।।ॐअघोरआदेश।।

*

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

*

ॐअघोरआदेश आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द नादसाधनासत्र नाम:स्मरण संतपरमपरावाणी स्तोत्रांजली, , , , ,

काम जारी हे

जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?

अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।

*

अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?

और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?

*

कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।

कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥

*

कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।

ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥

*

बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई

फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई

*

अब, जागो साधक प्यारे

बाद में क्यू पछता रे?

*

एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।

तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द, , ,

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु भजन में हे,

जो आनंद तत्व चिंतन में हे,

जो आनंद विषय त्याग में हे {वो भोग में नहीं},

जो आनंद एकांत में हे {संग में नहीं},

*

जो आनंद ध्यान में हे,

जो आनंद मौन में हे,

वो सहज आनंद,

हम से हे, हम में हे, हम ही हे।

*

वो सहज आनंद अपना स्वरूप हे।

वो आनंद राम मय हे।

वो राम आनन्दमय हे।

वो राम ही स्व स्वरूप हे।

*

जगत में हम नहीं, जगत हम में हे।

हम हमेशा हे थे रहेंगे।

हमारा कुछ नहीं।

सब कुछ राम हे।

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे।

आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, ,

जीवनमुक्ति

खाना पीना,

जगना सोना,

पाना खोना,

लेना देना,

रोना धोना,

जीना मरना,

सब संसार हे,

स्वार्थ हे

*

तत्व चिंतन साधना,

परमार्थ हे

*

बोध होना, जाना बनजाना,

जीवनमुक्ति हे

आकाशविश्ववाणी,

ओ साधक प्यारे!

ज्ञान भक्ति के पर फैलाकर,

स्वरूप गगन में उड़ज़ा साधक।

*

आत्म कृपा की धूनी चिताकर,

सत्संग भजन में रमजा साधक।

*

राम नाम की अलख लगाकर,

महत शून्य में खोजा साधक।

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द, ,
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