कैसे
जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।
जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?
जाग जा साधक, जग जा साधक,
यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,
हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।
~
जो सो रहा हे, उसे कोई जगा पाए।
जो सोने का ढोंग करे, उसे कोन कैसे जगावे!?
जाग जा साधक, जग जा साधक,
यहाँ मुर्दा लाश भी राम भजन जागती हे,
हसती हे, गाती हे, राम मय हो जाती हे।
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भोग मुक्त हो जाओ
रोग मुक्त हो जाओगे ।
भव रोग मुक्त हो जाओ
जीवन मुक्त हो जाओगे॥
*
अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे
मौन हो जाओ, चैन में रहोगे।
हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे
प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे॥
*
स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे
भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे।
सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे
अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे॥
*
पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे।
पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे॥
पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे।
पागल हो जाओ, मारामारी से बचोगे॥
*
सब व्यसन हे।
अच्छाई बुराई;
सब व्यसन हे।
अर्थ परमार्थ;
सब व्यसन हे।
कला स्वार्थ;
भलापन बुरापन;
बुढ़ापा बचपन;
सब व्यसन हे।
श्रद्धा साधन;
आत्मक्लेश परमेश;
जानना बनना;
सब हे, कुछ नहीं ;
में हू, जगत हे;
कृष्ण, राम, शिव, ब्रह्मा
सब व्यसन हे।
जताना, निभाना;
मौज भजन गाना;
सब व्यसन हे।
कल जो मंदिर मेखाना नजर आता था,
आज वो मेखाना मंदिर नजर आता हे।
अब साला व्यसन ही खुद में जीता हे।
पियक्कड़ साधक भोला, रात दिन पिता हे।
~
काम जारी हे।
असुविधा के लिये खेद हे।
अगर में ये करुंगा!
तो मुझे क्या मिलेगा?
कब मिलेगा?
{सारा जीवन कुछ पाने में बीत गया}
*
अभी ये सोचो
अभी क्या हे मेरेपास?
क्या दे सकता हू?
कैसे दे सकता हू?
{ये तो बस शुरुआत हे}
~
खुश रहो यार
जो होना हे
हो रहा हे।
आना जाना।
अपना कुछ भी नहीं।
ना हमने कुछ किया हे।
ना कुछ कमाया हे।
जो आपका हे, वो आपका हे।
जो नहीं हे, वो नहीं हे।
ये दुनिया एक सुंदर बगीचा हे।
करोड़ों फूल खिलते हे यहाँ।
मुरझाते भी हे।
अपना कुछ नहीं।
सब हो रहा हे।
एक सास अंदर
एक सास बाहर
आप जी रहे हो।
वो जीवन भी आपका नहीं
सब हो रहा हे।
अपना कुछ नहीं।
*
जो अपना हे नहीं
वो अपना समझो मत
उसका मालिक ना बन।
नहीं तो वो चोर कहलाए।
वैसे डकैत तो हो ही आप
जो देह भी अपना नहीं
उसे खुद मानके चले
चोर कहिके।
अपना कुछ नहीं।
~
*
जग जा साधक ।
पुकार आलख ।
छोड दे दुनियादारी ।
प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।
विश्व { एवं } मित्र
*
जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?
अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।
*
अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?
और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?
*
कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।
कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥
*
कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।
ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥
*
बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई
फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई
*
अब, जागो साधक प्यारे
बाद में क्यू पछता रे?
*
एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।
तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥
कुछ नहीं करना, कुछ नहीं पाना।
कही नहीं जुडना, कही नहीं जाना।
तू क्या बाहर ढूँड रहा हे।
वो तो भीतर सदा बसा हे।।
जो आनंद प्रभु भजन में हे,
जो आनंद तत्व चिंतन में हे,
जो आनंद विषय त्याग में हे {वो भोग में नहीं},
जो आनंद एकांत में हे {संग में नहीं},
*
जो आनंद ध्यान में हे,
जो आनंद मौन में हे,
वो सहज आनंद,
हम से हे, हम में हे, हम ही हे।
*
वो सहज आनंद अपना स्वरूप हे।
वो आनंद राम मय हे।
वो राम आनन्दमय हे।
वो राम ही स्व स्वरूप हे।
*
जगत में हम नहीं, जगत हम में हे।
हम हमेशा हे थे रहेंगे।
हमारा कुछ नहीं।
सब कुछ राम हे।
*
रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे।
नारी दुनियादारी।
न्यारी दुनियादारी।
कवारी दुनियादारी।
प्यारी दुनियादारी।।
ज्ञान भक्ति के पर फैलाकर,
स्वरूप गगन में उड़ज़ा साधक।
*
आत्म कृपा की धूनी चिताकर,
सत्संग भजन में रमजा साधक।
*
राम नाम की अलख लगाकर,
महत शून्य में खोजा साधक।