काम जारी हे

त्याग

Can you?

YES.

*

What really belongs you, that you can give up on!?

And WHO is giving up? what? Why?

*

We are empty. SOLID SPACE.

my fr!end.

{गुरूवचन सत्यवचन}

*

One thing to give up,

is the very thought of giving up!

*

KNOW Nonsense, NO Nonsense!

*

Relax!Max

*

Giving up! ये बस एक मन की खुजली हे!

साधक को ये बात सुलझी हे।

यहाँ अपना कुछ हे ही नहीं।

क्या त्याग करोगे?

*

बस त्याग के काबिल बनो,

जो जाना हे चला जाएगा,

जो रेहना हे रहेगा।

बस त्याग के काबिल बानो,

तब खुद का भी त्याग होगा।

कुछ छोड़ना, पाना नहीं,

जो चल रहा हे सब सही।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, ,

सच बता यार!

तू कौन हे? खुद कौन हे? और कौन हे तेरा खुदा?

सब हे यहाँ, सब हे तेरा, अब और क्या तू चाहता?

सच में बता, सच ही बता, और क्या तू चाहता?

*

रब हे तेरा, रब तुझमें हे, अब और क्या तुझे चाहिए?

क्यू ऐसी हरकत कर रहा? तुझको करे तुझसे जुदा?

क्यू ऐसी हरकत कर रहा? खुद को करे खुदसे जुदा?

*

तू कौन हे? क्यों हे यहाँ? इस जग से क्या तेरा वासता?

तेरे दिल में क्या ? खुल कर बता, क्यू खफ़ा यू हो रहा?

तू बेख़बर, और बेवजाह, यहाँ वहाँ, भटका घूमा?

*

तू कौन हे? खुद कौन हे? और कौन हे तेरा खुदा?

रब हे तेरा, रब तुझमें हे, अब और क्या तुझे चाहिए?

क्यू ऐसी हरकत कर रहा? तुझको करे तुझसे जुदा?

क्यू ऐसी हरकत कर रहा? खुद को करे खुदसे जुदा?

~

अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन,

चल ना भाई

चल ना भाई तू , समझता क्यों नहीं

– जिधर किधर हे अटका, उधर से निकलता क्यों नहीं

दिल तेरा दुनियासे फिसलता क्यों नहीं

– फक़ीर साधु बोला दिमाग़ में घुसता क्यों नहीं – तेरे

गुंडा गर्दी, दुनिया दारी, तू छोड़ता क्यू नही?

– क्या सही क्या गलत फैसला, तू करता क्यों नहीं

दुनिया में इज्जत से तू रहता क्यों नहीं

– चार शब्द बाते प्यार के तू बोलता क्यों नहीं?

तू जानता कुछ नही, ये तू मानता क्यों नहीं

– इधर उधर कुछ भी नही, अपने भीतर झाको

मन क्या तेरा शांत हे? राडे-लफड़े लाखों

जाग जा साधक

मे मर गया बाबा

राम नाम सत्य हे

अमर अनंत नित्य हे

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन, , , , ,

मे कोन हु?

“मे कोन हु?”

जब समझो, अगर ये सवाल मेरे मन; मुझे आता ही नही, तो ‘मे’ जैसे ‘जानवर’ हू या पशु-तुल्य हू।देह तो इंसान का हे। लेकिन सिर्फ { खाना – पीना + सोना + घर-बसाना + बच्चे पैदा करना } इतनाही। ऐसे जिंदगी गुजारते गुजारते, एक दिन ‘मे’ गुजर जाना, चल बसना। माने अभी तक कहानी शुरू ही नही हुई हमारी।

“भाई! मे हु कोन? कोन हु मे?” जब ये सवाल मे खुद से करता हु, कर पाता हु; तो मे ‘इंसान’ हू, ‘मनुष्य-प्राणी’ हू। खैर अपने इंसान होने का ये एक सिद्ध-लक्षण तो हे। अच्छा! खुद का अभिनंदन किजीए। कम से कम, जो हू समझता हु, कहलाता हू, वो तो हू। हम एक जिंदा-इंसान हे ।

आगे जाके,

अगर इस सवाल को मे अक्सर टालता हु, या इसको अनदेखा-अनजाना करता हु; तो मे ‘दुनिया मे फसा’ हू। याने संसार मे भटक रहा हू। सुखी-दुखी हो रहा हूँ। मेरा कुछ नही हो सकता। मेरे लक्षण कुछ ठीक नही। मे बहिर्मुखी इन्सान हू।

अगर इस सवाल को मे सिर्फ़ पालता हू। सवाल अंदर लेके, जवाब बाहिर ढूँढ रहा हू। मतलब मुझसे जो भी दुनिया-दारी हो रही हो, वो क़ायम हे, मगर ये सवाल मेरे मन के दरवाजे पर खड़ा हे। में कभी तो कुछ करु! राह देख रहा हे। पर मे संसारी हू।जब होगा तब होगा। देखा जाएगा।

अगर इस सवाल को मे मिटाना चाहता हू, तो साधक हू। इस सवाल को मिटाना, याने मे को जानना, मे को पाना, खुद से मिलना मेरे जीवन का साध्य बन जाता हे, अगर में क्वचित आत्म जिज्ञासा रखता हु; सत्संग रमता हु; भीतर खोज रहा हु; तो मे ‘साधक’ हू। अब आर या पार।

‘स्वयं को जानना’ अगर सिर्फ़ यही एक जीवन प्रयोजन, मेरा एकमेव लक्ष्य, संपूर्ण समर्पण, मतलब अब दुनिया से कोई मतलब नही, जो होगा वो होगा, देखा जाएगा। जब मेरी अघोर साधना जारी हे, इस स्थिति मे ‘अघोर साधक’ हू। याने नित्य स्वाध्याय-उपासना-सेवा-भजन।

अगर मे आगम-शास्त्र-आदेश, सत्-गुरु-वचन, साधु-संत-वाणी को आत्मसात करने की क्षमता, इच्छा रखता हु, और कर रहा हु, हम से हो रहा हे। अपने हर एक अनुभूति से सीख रहा हु; तो में अघोर शिष्य हू।

अगर वाकई मे ‘मे’ से एकत्व, पूर्णत्व, सत् चित् आनंद स्वरूप लख जाए, तो ‘मे’ केवल परम तत्व स्पंदन हू। साक्षात परब्रह्म प्रकटीकरण ‘मे’ द्वारा हो रहा हे।

अगर सत् गुरु कृपा से, ‘मे’ स्वरूप स्थित हे , तो मे अघोर आनंद हू। जिस काम से आये थे, वो निपट गया। नैया पार। आरपार – ‘एक जबरदस्त घुमाव’। सब धन्य धन्य हे।

*

या तो मे पशु-जानवर हे, इंसान हे, जिंदा इंसान हे, संसारी हे, साधक हे, या अघोर साधक, अघोर शिष्य, अघोर आनंद हे। बस यहा तक मे की मजाल हे।

इस पश्चात असंग-अघोर-साधना।

अगर मे अंतर्मुख

बाहिर घोर हे, अंदर अघोर हे। संग घोर हे, असंग अघोर हे।

अगर ये सवाल मिट गया हे, तो संत हू।

अगर ये सवाल पूछा, तो शिष्य हू।

अगर जवाब लखाया, तो गुरु हू।

अगर बाहर ढूँढा, तो घोर हू।

अगर भीतर टटोला, तो अघोर हू।

अगर में इच्छा आकांक्षा कर रहा हू, तो में अपूर्ण हू।

अगर मे मनो कामना का पीछा कर रहा हू, तो में संसारी ।

अगर मे भोग भुगत रहा हू, तो मे

अगर में सुखी-दुखी हो रहा हू तो मे

अघोर आत्म मंथन, ,

व्यसन

कल जो मंदिर,

शराब घर नजर आता था

*

आज वो शराब घर,

मंदिर नजर आता हे

*

अब

वो व्यसन

ही

खुद में जीता हे

*

पियक्कड़ भोला

रात दिन पिता हे

~

कृपा हे

कृपा हे

कृपा हे

Blog, , , ,

सब लिखा हे

{ अहु } अहं भाव { संसारी }

तेरा-मेरा, लेना-देना, सकाम-काज कुछ करता हे

खाना-पीना-सोना-उठना, वही-वही वक्त गुजरता हे

भूत-भविस-सपन-सवारे, सकल-जगत यू भटकता हे

हर बात-बात पे, सुखी-दुखी बन, सारा जीवन रोता हे

~

सब लिखा हे, सब लिखा, अहु कुछ भी ना पढ़ पाता हे

जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे

*

{ अवधू } अभाव { साधक – भक्त }

भजन-मगन, प्रभु-प्रीत-सखा बन, सहज मधुर धुन गाता हे

जो भी यहा हो, जैसा भी हे, कण-कण दर्शन पाता हे

कुछ-नाही चाहे, कुछ-नही करता, यू-ही सब हो जाता हे

अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे

~

सब लिखा हे, सब लिखा, अवधू सब पढ़ पाता हे

जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे

*

अवधू अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे

अघोर आनंद भजन, ,

खुद को साधो

संन्यासी साधक हे। संसारी साधक हे। साधु साधक हे। सिद्ध साधक हे। संत साधक हे।गुरु साधक हे। शिष्य साधक हे। मुमुक्षु साधक हे। महात्मा साधक हे।

और एक बात, साधक की कोई पहचान नहीं होती। वो सब में मिला हे, पर सब के परे हे। इर्द गिर्द दिखता नहीं, पर होता हे। पागल लगता हे, पर होता नही।

आप भी साधक हो। बस साधक ही रहो। स्वानुभव से सीखो। खुद को साधो।

*

ॐ अघोर आदेश, ,

भज अघोर गणेश

जय गणेश, जय-जय गणेश, जय-जय-जय गणपति सरकार,

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार

भजे भक्तगण गणाधीश रे सेवा कर स्वीकार

*

एक प्रार्थना, एक ही विनती

सदाचार हो, ना मति भ्रांति 

प्रीत हृदय हो, सत सुख शांति {हो मन निर्मल सुविचार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा कर स्वीकार}

*

आप ही तारे, आप सवारे, 

आप बचाये, आप से सिखा

साधक भगत तू राह दिखाया, { हो जीवन साकार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}

भजे भक्तजन, गणपति देवा, जीवन हो साकार

*

पशु पिशाच, तोरे ही शरण हे

भूत प्रेत, सुर असुर पूजते

हर हर हर हर, हर शिवगण के {आप सुमुख सरदार 

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}

*

राम नाम, आदेश स्मरण हे

मंगल सुकुशल, सब पावन हे।

जग चेतन, तुमसे रोशन, जो { तेरी, कृपा, आरपार

ॐअघोरानंद, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ साद स्वाद स्वीकार}

*

मूढ जगत जब, स्वार्थ साधते

साधन सामग्री तोहे पूजते

भटके खोये, हर पल रोए, दीन हीन संसार

भजे भक्तगण, गणाधीश सब सपने कर साकार}

*

कहा पधारे, सत् गुरु आश्रम मे

श्रवण, मनन चिंतन अनुभव मे

सहज सरल ख़ुद को पहचाने {त्रिभुवन के सूत्रधार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेऽवा सार्थ स्वीकार}

*

अखण्ड जीवन स्वात्म मंथन

अलखनिरंजन अलख निरंजन

अलक्ष लक्षण गुह्य प्रकट {तू मालिक सुनो पुकार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार

*

दूषित मन जो जगत मे खोया

वो ही मन तू भजन रमाया

सब जब खोया, खुद को पाया, ऐसा) चमत्कार 

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार

*

अघोर भगत, तेरे भजन मगन हे 

साधन काज तव भक्ति सुगम हे 

दिव्य मूर्ति अखंड स्मरण {अनजाना साक्षात्कार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार}

साधक साधु संत भगत के,

गुरु प्रेषक, सहारा बनके

एक प्रेरणा, एक उगम {तू शक्ति मूलाधार

हो सेवा सार्थ स्वीकार}

*

सत् संग, भजन, आरती, कीर्तन,

ये जीवन प्रभुनाद सनातन

स्पंद प्रणव प्रतिसाद अनाहत, { तू महत् शून्य आकार

भजे भक्तगण, गणाधीश हो सेवा सार्थ स्वीकार}

*

अघोर आनंद भजन, ,

जय माँ

जय माँ अघोरेश्वरी आल्हादिनी स्वतंत्र तारा,

परमेश्वरी, महादेवी, मुक्ता, (त्रिशूला) माता मधुरा

काली, दुर्गा, शक्ति, शांभवी, शिवा परापरा

*

चण्डी, चामुंडा, कपालीका, त्रिशूला (शूरा, वीरांगना)

भगवती, शांकरी, तापसी, जगत जननी

शैलजा, जया, गिरिजा, उज्वला, वंदना

परा अपरा परापरा

तुम ही, सब हो, तुमने ही सवारा

तेरी प्रीत, तेरी एक तुम हो सहारा

तेरी प्रीत, हर गीत, संगीत सतत धारा

चण्डी, महाकाली, भयभीत असुर मारा

जननी, जगत जननी, संसार जगत तारा

~

अघोर आनंद भजन, , ,

प्रकट गुह्य

संपूर्ण मे अपरिवर्तनीय परिवर्तन – प्रकट गुह्य

EVERY POUR OF EXISTENCE IS FILLED WITH DIVINE DIVINITY.

{ राम रसायन }

RAAMA RASAAYANA.

EVERYTHING IS { राम } RAAMA.

THROUGH AND THROUGH { आरपार }.

SOLID FLUX

{ आनन्दघन }

SOLID SPACE. दिव्य द्रव्य DIVINE DIVINITY.

अघोर आत्मभान obvious internalisation

INTERNALISATION

THE SILENCE & THE SOULITUDE

आरपार

होशियार हो तड़ीपार फ़रार

लगातार बरकरार हर बार

सरकार आधार बेकार

प्यार यार संसार बलात्कार

चमत्कार निराधार लाचार

सारासार विचार सत्कार

इसपार या उसपार, जीले आरपार

निर्विकार

नमस्कार सार साक्षात्कार

कोई आर, या कोई पार,

सच्चा समझदार आरपार

अघोर आत्म भान, ,

सवालजवाब

सवाल एक ही था, एक ही है, एक ही रहेगा।

मै कौन हूँ? दुनिया क्या है? 

यहा क्या हे मेरा वास्ता?

क्या हे वो रास्ता?

*

भगवान है? नही?

*

अगर है ही नही भगवान

तो बस बने रहो इन्सान।

भोग मगन हैवान

चंद पल के मेहमान।

*

मानो वो है।

तो क्या है वो?

*

जवाब एक ही है

मै हूँ।

बस हूँ।

कुछ नही, कोई नही, कभी नही।

सब कुछ, हर कोई।

*

जरा सोचो साधक भोला

कर ले खुद, खुद की पहचान

कितना जीया बने अंजान

तू तो अपने घर मेहमान

*

पता ज़रूरी हे

काम जारी हे

आत्माचिंतन, ,

व्यसन

सब व्यसन हे।

अच्छाई बुराई;

सब व्यसन हे।

अर्थ परमार्थ;

सब व्यसन हे।

कला स्वार्थ;

भलापन बुरापन;

बुढ़ापा बचपन;

सब व्यसन हे।

श्रद्धा साधन;

आत्मक्लेश परमेश;

जानना बनना;

सब हे, कुछ नहीं ;

में हू, जगत हे;

कृष्ण, राम, शिव, ब्रह्मा

सब व्यसन हे।

जताना, निभाना;

मौज भजन गाना;

सब व्यसन हे।

कल जो मंदिर मेखाना नजर आता था,

आज वो मेखाना मंदिर नजर आता हे।

अब साला व्यसन ही खुद में जीता हे।

पियक्कड़ साधक भोला, रात दिन पिता हे।

~

काम जारी हे।

असुविधा के लिये खेद हे।

जीवनमुक्तछन्द,

तू साधु

\"\"
साधु साधु

मानले

जानले

आनंद ले

जानके

*

तू साधु

*

जीवन मुक्त

*

तू साधु

*

सेवा धर्म तेरा

हृदय प्रेम भरा

साधना कर्म तेरा

तू साधु

*

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन, , ,

काम जारी हे

जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?

अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।

*

अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?

और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?

*

कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।

कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥

*

कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।

ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥

*

बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई

फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई

*

अब, जागो साधक प्यारे

बाद में क्यू पछता रे?

*

एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।

तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द, , ,
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