साधक भोला राम भरोसे

त्याग

Can you?

YES.

*

What really belongs you, that you can give up on!?

And WHO is giving up? what? Why?

*

We are empty. SOLID SPACE.

my fr!end.

{गुरूवचन सत्यवचन}

*

One thing to give up,

is the very thought of giving up!

*

KNOW Nonsense, NO Nonsense!

*

Relax!Max

*

Giving up! ये बस एक मन की खुजली हे!

साधक को ये बात सुलझी हे।

यहाँ अपना कुछ हे ही नहीं।

क्या त्याग करोगे?

*

बस त्याग के काबिल बनो,

जो जाना हे चला जाएगा,

जो रेहना हे रहेगा।

बस त्याग के काबिल बानो,

तब खुद का भी त्याग होगा।

कुछ छोड़ना, पाना नहीं,

जो चल रहा हे सब सही।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, ,

ओ भोले साधक!

परमार्थ में मन नहीं लगता,

मन संसार स्वार्थ में रमता,

जप जाप ताप सा भाता

अब क्या करे साधक?

*

ओ भोले साधक!

मन लगने से जप नहीं होता,

जप जपनेसे से मन लगता हे,

स्वरूप साधना में।

*

जीवन में साधना की नहीं जाती,

साधना में जीवन जीते हे,

जीवन ही साधना हे,

सदा सर्वदा।

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , ,

रे ऽ प्यारे ! शुरू तो करो

साधु संत सत् वचन – को माने

अब तो खुद को – शिष्य तू जाने

हर अनुभव से सीखे – वो साधक

ये दुनिया – जीवनशाला प्यारे

यह जो सिखा – सो जीवन उतारा

खुद देखा उजियाला – प्यारा

*

ये दुनिया – रख जैसी वैसी

ये दुनिया – तो ऐसी ही थी

ऐसी ही रहेगी

दुनिया से – क्या लेना देना?

सारा जीवन – व्यर्थ गवाना

हर पल – कुछ भी – सीख ना आना

*

यहा सच्चा – जो करने आया

अब तो काम – वही हे करना

साधक भोला – राम भरोसे

गुरु चरण पे – माथ टिकाके

शुरू करो साधना

बस शुरू करो साधना

*

रे ऽ प्यारे ! बस तुम शुरू तो करो यारा

अघोर आत्म मंथन अघोर आनंद भजन, ,

मस्त

विश्व गीत मधुर स्वर गाना ।

सत्संग भजन तू कर रोज़ाना।।

साधन गुरु मंत्र तू हर पल जपना।

हर करम शंभु समर्पित करना।।

*

मुफ़्त का खाना कभी ना खाना।

पर साधक भोले मस्त तू रेहेंना।।

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन,

अलख अमल, अल्-मस्त खजाना

सत् संग भजन – कर तू रोज़ाना

विश्व गीत – सुमधुर स्वर गाना

श्री सत् गुरु मंत्र – निरंतर जपना

हर करम – शंभु समर्पित करना

*

बिन सेवा – एक भी पल ना गवाना

तू मुफ़्त का खाना – कभी ना खाना

संसार की खटिया – कही ना सोना

जब दुनिया सोवे – तब तू जगना

*

उस शून्य गुफा – तू डटके रहना

ना कही आना – कही ना जाना

यहा तेरा – कुछ भी ना लेना देना

जो मन चाहे गाली – दे ये जमाना

*

पर साधक भोले – मस्त तू रेहेंना

*

ॐ अघोर आदेश अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन, , ,

इधर गया वो उधर भी भटका

सच ना मिला संसार में।

जगत में उलझा, कभी ना सुलझा,

सब लेन देन व्यापार रे।।

*

स्वान्तर भीतर ड़ुबकी लगाई,

प्रेमानंद मिला उस पार रे।

भोला साधक सब संत क़हत,

यहा प्यार से हो व्यवहार रे।।

*

साधक भोला सरल सहज रह,

मत कर जग से व्यापार रे।

साधक भोला राम भरोसे,

भूल ना जाना प्यार रे।।

अघोर आनंद भजन,

साधक परिचय

एक दोपहर साधक इधर उधर भटकते भटकते एक पुरातन शिव मंदिर आ पहुँचा। शहर के भीड़भाड़ में कही शांत जगह, वो भी जाह आप जितना समय चाहो, खुद के संग बिता पाओ तो भगवान शरण शिवालय साधक का आसरा बनती हे। साधक कुछ समय मौन रहा, फिर जब गर्भ गृह में बिलकुल एकांत पाया तब प्रणव उच्चारण कर महा मृत्युंजय मंत्र स्मरण किया। सुंदर शिवमय समय बीता।

{मंदिर के बाहर चाय की टपरी पर, साधक इस बारी दुनिया के पकड़ में ना आया। स्वस्वरूप निष्ठा कभी ना खोया।}

बुढ़ाऊँ: आप का भजन सुना, एक पवित्र शान्ति महसूस हुई। क्या कुछ समय आप से कुछ बात हो सकती हे?

साधक: जी बोलिए, महाराज।

बुढ़ाऊँ: आप का नाम?

साधक: साधक भोला राम भरोसे

बुढ़ाऊँ: ये कैसा नाम हे? आप का असली नाम पता क्या हे?

साधक: गुरु कृपा से, असली नक़ली सब भेद खतम। आप जो चाहो वो बुलाओ, हम तो भोला राम भरोसे हे। जो हूँ, जैसा हूँ, आपके सामने हूँ! अभी जहां हूँ, वो ही मेरा अतापता हे।

बुढ़ाऊँ: कौन हे आप के गुरु? क्या अध्यात्मिक जीवन जी रहे हो ? किस मार्ग से साधन हो रहा हे? कौन सा पंथ? सन्यासी हो? हम आप के बारेमे जानना चाहते हे, हम भी अध्यात्म में रुचि रखते हे, बस सांसारिक ज़िम्मेदारी से उथल पुथल हो गए थे।आप के प्रवास बद्दल कुछ बताओ।

साधक: बस एक आनंद यात्री हूँ। संत वचन सत्य वचन जानके, मानके, गुरु उपदेश पर जीवन संगीत गा रहे हे। अच्छा समय बीत रहा हे। राम नाम की महफ़िल में रंग आए हे।

बुढ़ाऊँ: आप के गुरु का नाम? कहा हे वो? क्या हम मिल सकते हे? उनका आश्रम कहा हे? आप ने गुरु कैसे पाया?

साधक: राजाधिराज सतगुरुनाथ महाराज। मेरे हृदय में निवास करते हे। पूरा ब्रम्हाण्ड उनका आश्रम हे। परमेश्वर कृपा से गुरु ने अपनाया। जब दिल और दिमाग़ का नशा उतर गया, तब गुरु तत्व सामने पाया। वो सदा चेतन वह ही था, हम देख ना पाए जो दुनियादारी के महामारी से ज़खड गए थे। भटक गये थे, संत कृपा से वापसी हुई, अब कही ना आना ना जाना।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ समझे नहीं। सच सच बताओ साधक, हम वाक़ई जानना चाहते हे।

साधक: महाराज, अब और क्या सच हे जो आपको बताए। आप जो सुनना चाहते हो वो बताऊँ, तब ही तसल्ली होगी?

बुढ़ाऊँ: हम भी अध्यात्मिक जीवन अपनाना चाहते हे। हमें कुछ मार्गदर्शन करिए।

साधक: हम एक साधक हे, यात्री हे, सदा के लिये। हम क्या किसी को रह दिखाए। संत वाणी मार्गदर्शक हे। संत वचन सत्य वचन हे। श्रद्धा और विश्वास से संत हृदय का बोध होगा। ये सहज आनंद मार्ग हे। राम नाम की धुन जीवन संगीत हे। आत्म चिंतन, आत्म कृपा, आत्म ज्ञान ही प्रभु चिंतन, प्रभु कृपा, प्रज्ञा हे। अनुभूति, अनुभव बोध हे। गुरु बिन, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलेगी, अध्यात्म की खिचड़ी नहीं पकेगी।

{साधक बीड़ी जलाता, चाय का आनंद ले रहा था।}

बुढ़ाऊँ: ये बीड़ी, नशा?

साधक: बीड़ी परमात्म सीढ़ी। ये हमें गेरुए वस्त्र और आडम्बर से अलिप्त रखती हे। राम नाम के नशेडी हे हम, ये नशा कभी न उतरेगा, ये बीड़ी भी कभी ना छूटेगी। कुछ पकड़ने ने छोड़ने वालोमेसे साधक नहीं। जो लिखा हे वो हो रहा हे।

बुढ़ाऊँ: हम तो आप को सज्जन सात्विक समझे। वैसे क्या कह रहे थे आप? जो जो लिखा हे सब हो रहा हे? किस ने लिखा? क्या लिखा?

साधक: सब लिखा हे, महाराज। उसने लिखा हे। अगर कोई पढ़ पाए।

बुढ़ाऊँ: हम कुछ नहीं समझे।

साधक: ये तर्क, समझ, कार्य कारण के परे हे।

बुढ़ाऊँ: हमें मोक्ष प्राप्ति चाहिए, इसी जन्म में!

साधक: हमें याने किसे? आप हे कोन? ये मोक्ष क्या होता हे?

बुढ़ाऊँ: मुक्ति, साकेत, स्वर्गलोक शायद, ऐसा ही कुछ, हम नहीं जानते।

साधक: जो आप जानते तक नहीं, वो आप को क्यू चाहिये?

बुढ़ाऊँ: वो हम नहीं जानते, बस हमें मुक्ति दिलादो, नैया पार करादे कोई।

साधक: तो आप ग़लत जगह आए हो महाराज, आप को शिवालय नहीं किसी अध्यात्मिक बनिये के दुकान में, अच्छे दाम में मुक्ति मिलेगी। वो बाहर वाला रास्ता हे, पाओ मुक्ति, भरो अपने झोले में, और फिर अपनी दुकान भी खोलो।

शिव अंदर की राह हे, आपको बरबाद कर देगी।

बुढ़ाऊँ: आप किसी सिद्ध महात्मा गुरु को जानते हो?

*

अघोर आत्म भान, , , , ,

जागो!

लाखों सपने इरादे, ना एक हकिकत होवे,

फिर भी तू तकता जावे, फिर भी तू थकता जावे।

*

और जब एक भी इच्छा पार हुई, तब दूजी अपना राज चलावे।

ये तो मायाजाल रचा हे, इंद्रधनु मृगजाल गवाह हे,

अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।

अजब रसायन बनके मन में, तुमको इसमें खींच रहा हे।

*

तू भवर में डूबा जावे, अब कोन तुम्हें बतलावे,

और कोन किसे हे बचावे, कोन किसे हे बचावे।

*

एक ही साध्य है, एक हे साधन, एक गुरु हे, एक हे भगवन।

साधक खुद ही खुद को जगावे, साधक खुद ही खुद को जगावे।

~

साधक भोला राम भरोसे, ले खाली झोला प्यार परोसे

अघोर आत्म भान अघोर आनंद भजन,

उद्यमो भैरव:

उद्यमो भैरव:

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

उद्यमो भैरव:

ॐ अघोर आदेश अघोर आनंद भजन, , , , ,

साधना क्या हे?

हम ये करते हे, वो करते हे, बड़ी साधना करते हे, कहते हे।

असल में ये उँट पटंग, साधना हे?

आख़िर साधना हे क्या?

और साधना से क्या साधना हे?

एक ही साधन हे। बाक़ी सब तमाशा।

अपने अंत:करण की स्थिति को पहचान साधक।

मन तो आइना हे, जगत संसार की प्रतिमा मन में नैसर्गिक हे। जीव- जगत – वस्तु, वातावरण के अनुसार मन में संकल्प-विकल्प आते रहेंगे। अच्छे-बुरे विचार आते-जाते रहेंगे। ये द्वैत की बू स्वाभाविक हे। बाहिर जो हो रहा हे वो होने दो, जैसा हो रहा हे होने दो, अपने भीतर झाँको साधक।

बस इतनाहि करो, ध्यान दो की ये मन इन विचारो से प्रभावित ना हो, विक्षेपित ना हो। इस जगत में अंदर बाहिर कुछ भी हो जावे, साधक का मन कभी विक्षेपित ना हो। कभी किसी बात से मन विक्षेपित हुआ ही, तो उस अनुभव से सीखो। आत्म चिंतन करो। धीरे धीरे मन शांत हो जाएगा।

फिर भी सिख ना पाओ, तो उपासना जैसे सत्संग, भजन, नाम:स्मरण, संत सेवा में मन को लगाओ। उपासना से मन:शुद्धि हो जाती हे। संसारी मन ही साधक मन हो जात हे।

चाहे कैसे भी विचार हो, इन विचारो की शृंखला को ही विक्षिप्त मन कहते हे। अत: राम नाम को अपनी साँस से बांधो। नाम ही इस शृंखला का प्रतिबंध हे। भजन मगन रहो।

स्व स्वरूप में बिलकुल स्थित रहेना हे।

अपने मन की शान्ति कभी, किसी कारण छूटे नाहीं, ये सावधानी ही असल में साधना कहलाती हे।

ये साधना अखंड चलती रहे। इस में बाधा ना आवे।

सदा चेतन रहो, प्रसन्न रहो, सदा आनंद में रहो।

आनंद को पाना नहीं हे। वो तो भोग कहलाता हे। आता जाता हे।

आनंद में रहना हे। आत्म आनंद, बस अपने होने का आनंद।

स्व स्वरूप सत् चिदानंद ही हे।

ध्यान करो नहीं, ध्यान दो।

बस इस बात पे ध्यान दो।

सावधान हो जा साधक।

बाहर कुछ नहीं, सब मन का खेल हे।

बाक़ी कुछ करो ना करो, कुछ फ़रक नहीं पड़ता।

बस भीतर ध्यान दो।

काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह ही मन के विक्षेप हे।

देखो कही किसी व्यक्ति वस्तु विशेष से मन आसक्त तो नहीं?

ये आसक्ति जा-सकती हे।

गुरु वचन सत्य वचन।

शांत, प्रसन्न साधक मन ही, एक में विलीन हो जाता हे।

परमात्म दर्शन अपने भीतर ही हो सकता हे, स्व स्वरूप।

प्रभु कृपा, गुरु कृपा, और अघोर आत्म कृपा से, साधक हृदय में ही परमात्मा प्रकट होता हे।

साधना से कुछ साधना नहीं।

नया कुछ नहीं मिलेगा, जो आपका ही था, हे, रहेगा – वो आपको पुन: प्राप्त होगा।

जाग जा साधक प्यारे।

~

साधक विश्व वाणी

Blog अघोर आत्म मंथन, , ,

साधक प्रेम / संबंध

प्रभु की अमर्याद कृपा हे, गुरु आशीर्वाद कृपा साधक अपूर्ण प्रेम, प्यार, खालीपन के रिश्ते, संबंधों में फसा नही, ना किसे फसाया। लेकिन धक्के खा खा के ही सीखा। प्रलोभन, प्रयोग सब जारी था, मगर विवेक, सावधानी, सजर्गता, सत्संग अखंड शुरू रहा। जिसके चलते क्षणिक-आनंद-उपाय जो आजन्म-बंधन के दूत हे, उनकी नजरोसे साधक बच गया। अघोर-परिपूर्ण-प्रेम-स्पंदन पश्चात, परिच्छिन्न-वैयक्तिक-प्रेम-अनुभव की परिभाषा कदा हजम नही होती, ना हो सकती हे। ये ही पूर्णत्व की निशानी हे, जो वैराग्य शक्ति हे। माँ तारा मातृका हे।

भौतिक प्रेम के प्रति कुछ अच्छी-बुरी बात नही, वो अपूर्णता दर्शाती हे।जो हे वो हे। बस इतना जानना मात्र हे के {भौतिक प्रेम परिपूर्ण नही होता}। इस कारण वासना कहलाता हे। बच गये बढ़िया हे।

जो हो गया हो गया। अब अखंड सावधान भजन {स+अवधान} जारी हे, जाहिर हे। अब परिपूर्ण प्रेम हे, कोई संबंध नही। अब संपूर्ण व्यक्त हे, कोई व्यक्ति नही।

धन्य हे। ओम भोले, तेरे खेल निराले।

॥ ओम अघोर आनंद ॥

साधक

सत्य शांति प्रेम ये तत्त्व मे शामिल नही हे। वो सत् चित् आनंद स्वरूप निरंतर हे।

शिव – चित् + आनंद शक्ति

चित्-आनंद रूप: शिवोहम शिवोहम ।

शिव शिव शिव कल्याण करी ।

चित्-विलास = आरपार

अघोर आत्म भान अघोर आत्म मंथन, , , ,

अघोर कृपा

ये संसार, ये घरदार

तेरा दरबार

*

तू राह दिखाया

भजन गवाया

संत नहलाया

*

भोले वो प्यार जताया

भोला सत् गुरु पाया

~

साधक भोला सत् गुरू पाया

भोला साधक आत्म समाया

अघोर आनंद भजन, ,

व्यसन

कल जो मंदिर,

शराब घर नजर आता था

*

आज वो शराब घर,

मंदिर नजर आता हे

*

अब

वो व्यसन

ही

खुद में जीता हे

*

पियक्कड़ भोला

रात दिन पिता हे

~

कृपा हे

कृपा हे

कृपा हे

Blog, , , ,

पागल

भोग मुक्त हो जाओ

रोग मुक्त हो जाओगे

भव रोग मुक्त हो जाओ

जीवन मुक्त हो जाओगे

~

जागो साधक भोला

अंतर्मुख हो जाओ, मौन में रहोगे

मौन हो जाओ, चैन में रहोगे

हृदय से व्यवहार करो, प्यार में रहोगे

प्रभु प्यार में रहो, आनंद में रहोगे

*

स्वावलम्बन अपनाओ, सदा स्वस्थ्य रहोगे

भजन सेवा करो, सदा व्यस्त रहोगे

सहज एकांत पाओ, सदा चुस्त रहोगे 

अघोर सत्य गाओ, सदा मस्त रहोगे

*

पागल हो जाओ, दुनियादारी से बचोगे

पागल हो जाओ, महामारी से बचोगे

पागल हो जाओ, यारी प्यारी से बचोगे

पागल हो जाओ, बेवकूफ़ी से बचोगे

*

अघोर आत्म भान, ,

सब लिखा हे

{ अहु } अहं भाव { संसारी }

तेरा-मेरा, लेना-देना, सकाम-काज कुछ करता हे

खाना-पीना-सोना-उठना, वही-वही वक्त गुजरता हे

भूत-भविस-सपन-सवारे, सकल-जगत यू भटकता हे

हर बात-बात पे, सुखी-दुखी बन, सारा जीवन रोता हे

~

सब लिखा हे, सब लिखा, अहु कुछ भी ना पढ़ पाता हे

जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे

*

{ अवधू } अभाव { साधक – भक्त }

भजन-मगन, प्रभु-प्रीत-सखा बन, सहज मधुर धुन गाता हे

जो भी यहा हो, जैसा भी हे, कण-कण दर्शन पाता हे

कुछ-नाही चाहे, कुछ-नही करता, यू-ही सब हो जाता हे

अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे

~

सब लिखा हे, सब लिखा, अवधू सब पढ़ पाता हे

जो-जो जब-जब होना हे, सो-सो तब-तब होता हे

*

अवधू अघोरानंद साधक भोला, राम भरोसे जीता हे

अघोर आनंद भजन, ,

सोचो साधक भोला

सोचो साधक भोला

क्या ही फरक पडता है?

सब कल्पना मात्र ही तो है।

बाकी है ही क्या? सोचो

*

सोचो साधक भोला

क्या ही फरक पडता है?

हम वो नही, जो जीता है।

हम खुद है, वो जिंदगी।

*

हम जीव नही, हम जीवन है।

सत् निरंतर निरंजन है॥

हम जीव नही, हम जीवन है।

हम सत् निरंतर निरंजन है॥

*

अघोर आनंद भजन

खुद को साधो

संन्यासी साधक हे। संसारी साधक हे। साधु साधक हे। सिद्ध साधक हे। संत साधक हे।गुरु साधक हे। शिष्य साधक हे। मुमुक्षु साधक हे। महात्मा साधक हे।

और एक बात, साधक की कोई पहचान नहीं होती। वो सब में मिला हे, पर सब के परे हे। इर्द गिर्द दिखता नहीं, पर होता हे। पागल लगता हे, पर होता नही।

आप भी साधक हो। बस साधक ही रहो। स्वानुभव से सीखो। खुद को साधो।

*

ॐ अघोर आदेश, ,

व्यसन

सब व्यसन हे।

अच्छाई बुराई;

सब व्यसन हे।

अर्थ परमार्थ;

सब व्यसन हे।

कला स्वार्थ;

भलापन बुरापन;

बुढ़ापा बचपन;

सब व्यसन हे।

श्रद्धा साधन;

आत्मक्लेश परमेश;

जानना बनना;

सब हे, कुछ नहीं ;

में हू, जगत हे;

कृष्ण, राम, शिव, ब्रह्मा

सब व्यसन हे।

जताना, निभाना;

मौज भजन गाना;

सब व्यसन हे।

कल जो मंदिर मेखाना नजर आता था,

आज वो मेखाना मंदिर नजर आता हे।

अब साला व्यसन ही खुद में जीता हे।

पियक्कड़ साधक भोला, रात दिन पिता हे।

~

काम जारी हे।

असुविधा के लिये खेद हे।

जीवनमुक्तछन्द,

खेल

इस जिन्दगीके खेल में 

कुछ हार है, कुछ जीत है |

सब कुछ यहा पर कुछ नही

ऐसी अजब ये रीत है ||

*

क्या सही क्या है नही

इस खोज में खोता रहा |

ढूंडे कहानी अनकही

में हर दिशा जाता रहा |

ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी।

*

कुछ ये किया कुछ वो किया

अच्छा लगा अपना लिया |

कुछ ये किया कुछ वो किया

जो था गलत दफ़नादिया |

ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी।

*

में कही मंजिल कही

और क्या बनी ये जिंदगी |

तू सही तू सही

तेरे सिवा कोई नही |

ऐसे जिया ऐसे जिया जिंदगी।

*

इस जिंदगी के खेल में

अब क्या बसा आराम है |

तू वो ही कर जो मन में है

हर काम में फिर राम है ||

~

आनंदभजन, , ,

सुख दुख

थोडा सुख होना थोडा दुख होंना 

पर जो भी होना अच्छा होना रे |

तेरे लिए गाऊ में तेरा बन जाऊ

में ऐसी जिंदगानी जीना रे ||

*

सब झूटी मेरी बाते, झुटे है इरादे |

झूटी मेरी चाहत, और झूठे मेरे सपने |

मेरे सपने सच ना होना रे…

तेरे लिए गाऊ में तेरा बन जाऊ

में ऐसी जिंदगानी जीना रे ||

*

ये कैसी कैसी दुनिया, और क्या है दुनियादारी |

ये कैसे रिश्ते नाते, सब क्या है मारामारी |

जो सिनेमे कटारी होना रे…

तेरे लिए गाऊ में तेरा बन जाऊ

में ऐसी जिंदगानी जीना रे ||

*

न कोई मेरा अपना, न कोई है पराया |

तनहाई ने जताया, ये जग है मेरा साया |

अंधेरो में साया भी खोणारे…

तेरे लिए गाऊ में तेरा बन जाऊ

में ऐसी जिंदगानी जीना रे ||

*

में तेरे बिना कैसे जीना, में तेरे बिना कैसे जीना ||

तू नाही कोई नाही, कोई नाही तेरे बिना |

दिन नाही शाम नाही रैना नाही तेरे बिना |

सुख नाही दुख नाही चैन नाही तेरे बिना |

में तेरे बिना कैसे जीना में तेरे बिना कैसे जीना ||

*

तेरे लिए गाऊ में तेरा बन जाऊ

में ऐसी जिंदगानी जीना रे ||

थोडा सुख होना थोडा दुख होंना 

पर जो भी होना अच्छा होना रे |

~|

आनंदभजन, ,

अपना कुछ भी नहीं

जो होना हे

हो रहा हे।

आना जाना।

अपना कुछ भी नहीं।

ना हमने कुछ किया हे।

ना कुछ कमाया हे।

जो आपका हे, वो आपका हे।

जो नहीं हे, वो नहीं हे।

ये दुनिया एक सुंदर बगीचा हे।

करोड़ों फूल खिलते हे यहाँ।

मुरझाते भी हे।

अपना कुछ नहीं।

सब हो रहा हे।

एक सास अंदर 

एक सास बाहर

आप जी रहे हो।

वो जीवन भी आपका नहीं

सब हो रहा हे।

अपना कुछ नहीं।

*

जो अपना हे नहीं

वो अपना समझो मत

उसका मालिक ना बन।

नहीं तो वो चोर कहलाए।

वैसे डकैत तो हो ही आप

जो देह भी अपना नहीं 

उसे खुद मानके चले

चोर कहिके।

अपना कुछ नहीं।

~

आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, , ,

तू साधु

\"\"
साधु साधु

मानले

जानले

आनंद ले

जानके

*

तू साधु

*

जीवन मुक्त

*

तू साधु

*

सेवा धर्म तेरा

हृदय प्रेम भरा

साधना कर्म तेरा

तू साधु

*

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन, , ,

उद्यमो भैरव:

\"\"
।।ॐअघोरआदेश।।

*

जग जा साधक ।

पुकार आलख ।

छोड दे दुनियादारी ।

प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।

विश्व { एवं } मित्र

*

ॐअघोरआदेश आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द नादसाधनासत्र नाम:स्मरण संतपरमपरावाणी स्तोत्रांजली, , , , ,

काम जारी हे

जागो साधक प्यारे! जरा सोचो जीवन क्या रे?

अब ही तो सार्थ समय हे, तू बाद में ना पछता रे।

*

अब किसको क्या है जताना? दुनिया में सुख पद सोना?

और कितना क्या पाना है? और कहा किधर जाना है?

*

कबसे तू काम जुटा हे, कब होगी व्यर्थ कामना पूरी।

कुछ वादे कुछ मजबूरी, बस ये आखरी बात अधूरी॥

*

कहाता तू काम है जारी, ये हो खतम ना ज़िम्मेदारी।

ये तो चलता ही रहेगा, रह गयी आखरी बात अधूरी॥

*

बस इतना जब कर लू में, तब चैन की साँस लू भाई

फिर तो में चल ही पडुंगा, वो राह जो तुम ने दिखाई

*

अब, जागो साधक प्यारे

बाद में क्यू पछता रे?

*

एक दिन तो ऐसा आवे, गुरु स्थूल की चाह मिटावे।

तेरे दिल में प्रभु पधारे, तुझे प्रीत की राह दिखावे ॥

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द, , ,

भूल ना जाना प्यार रे

इधर गया वो उधर भी भटका,

सच ना मिला संसार में।

जगत में उलझा, कभी ना सुलझा,

सब लेन देन व्यापार रे।।

*

स्वान्तर भीतर ड़ुबकी लगाई,

प्रेमानंद मिला उस पार रे।

भोला साधक सब संत क़हत,

यहा प्यार से हो व्यवहार रे।।

*

साधक भोला सरल सहज रह,

मत कर जग से व्यापार रे।

साधक भोला राम भरोसे,

भूल ना जाना प्यार रे।।

आनंदभजन

आनंद चिंतन

जो आनंद प्रभु भजन में हे,

जो आनंद तत्व चिंतन में हे,

जो आनंद विषय त्याग में हे {वो भोग में नहीं},

जो आनंद एकांत में हे {संग में नहीं},

*

जो आनंद ध्यान में हे,

जो आनंद मौन में हे,

वो सहज आनंद,

हम से हे, हम में हे, हम ही हे।

*

वो सहज आनंद अपना स्वरूप हे।

वो आनंद राम मय हे।

वो राम आनन्दमय हे।

वो राम ही स्व स्वरूप हे।

*

जगत में हम नहीं, जगत हम में हे।

हम हमेशा हे थे रहेंगे।

हमारा कुछ नहीं।

सब कुछ राम हे।

*

रामनाम स्वयं सर्व व्यापक हे।

आकाशविश्ववाणी आत्माचिंतन जीवनमुक्तछन्द, ,

ओ साधक प्यारे!

ज्ञान भक्ति के पर फैलाकर,

स्वरूप गगन में उड़ज़ा साधक।

*

आत्म कृपा की धूनी चिताकर,

सत्संग भजन में रमजा साधक।

*

राम नाम की अलख लगाकर,

महत शून्य में खोजा साधक।

आकाशविश्ववाणी आनंदभजन जीवनमुक्तछन्द, ,

अब ना कोई काम जगत से 

अब ना कोई काम जगत से,

साधक भोला राम भरोसे।

ज्ञानी भगत हरी भजन परोसे,

भोला साधक राम भरोसे।।

*

स्व-स्वरूप अब राम लख़ाना,

राम ही जीना,

राम ही खाना

राम ही जगाना सोना।।

*

राम नाम ही स्वप्न सुषुप्ति।

राम नाम ही सिद्ध समाधि।

श्री राम नाम हर सास समाया।

राम नाम हर स्वर वो गाया।।

*

राम राम राम राम।

राम नाम ही गाना।

राम राम राम राम।

राम नाम ही गाना।

*

राम नाम का नशा जगाया।

भोले भजन त्योहार मनाया।

स्व-स्वरूप सब राम लखाया।

साधक भोला राम समाया।।

*

अब ना कोई काम जगत से।

साधक भोला राम भरोसे।

अब ना कोई काम जगत से।

भोला साधक राम भरोसे।।

आनंदभजन

नाम

नाम सदा में तेरे गाऊ, तेरे गाऊ।

सब हे तेरा में तुम में समाऊँ, में तुम बनजाऊ।

*

कौन हू में, गुरु तुमने लखाया, स्वरूप जगाया।

क्या हे दुनिया, प्रभु तुमने जगाया, स्वरूप लखाया।

*

दूषित मन में, तू अभेद जगाया, परमेश दिखाया।

जो भी यहा, तेरी परछाया, तेरी लीला माया।

*

आनंद तेरा, सनातन चेतन गीत सुनाया, गीत गवाया।

गूंज रहा, एक नाद अनाहत, तेरी साद अनाहत।

*

नाम सदा में तेरे गाऊ, तेरे गाऊ।

सब हे तेरा, में तुम में समाऊँ, में तुम बनजाऊ।

नाम सदा में तेरे गाऊ, तेरे गाऊ

*

Now & forever, be I Sing Thy sweet name.

All & everything is Yours, be I merge in Thou, I be Thou

*

Who I am…? Master Thy grace has illuminated The Self

What is world…? Thy light; unfolded the essence of The Self

*

Striking the non-difference in impure mind, Thou reveal The Supreme Being

Whatever that is around is but Thy reflection, Thy play, Thy illuminance

*

Thy bliss, resonated unto me, Thathat eternal aLive song, I sing along

Thathat unstruck sound&silence echoes in me as Thy calling

आनंदभजन

राम भरोसे

साधक भोला राम भरोसे।

भोला साधक नाम भरोसे।

*

प्रभु चिंतन, सत्संग भजन रमता हे।

सुंदर शिव, अघोर सत्य जपता हे।।

*

सत् भाव-सहज, प्रीत सखा जनी जीता।

एकांत शांत-सुख, शून्य धूनी वो रमाता।।

*

गम्भीर सुमुख, चेतन गोरख सब भाता।

शुभ्र चित्त, एकाग्र मती स्वर पाता।।

*

साधु-संत-गुरु-नाथ वचन मनी स्मरता।

आदेश श्रवण, उत्स्फूर्त वचन धुन गाता।।

*

साधक भोला राम भरोसे।

भोला साधक नाम भरोसे।।

*

परमार्थ उपासक, स्वरूप – सेवक।

उद्यम भैरव, मुक्त सदाशिव।

हृदयी बालक, राम भगत-हरी भजे।

*

प्रभु-चिंतन, सत्संग भजन में रमता।

सुंदर शिव, अघोर सत्य में समाता।।

*

भोला साधक नाम भरोसे

साधक भोला राम भरोसे

आनंदभजन
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